गुरुवार व्रत कथा | मनवांछित फल दायक उपवास

      गुरुवार की व्रत कथा

एक नगर में एक बड़ा व्यापारी रहा करता था। वह जहाज में माल लदवा कर दूसरे देशों को भेजा करता था और खुद भी जहाजों के साथ दूर-दूर के देशों को जाया करता था। इस तरह वह खूब धन कमाकर लाता था। उसकी गृहस्थी बड़े मजे से चल रही थी। वह दान पुण्य भी खूब दिल खोलकर करता था। परंतु उसका इस तरह से दान देना उसकी पत्नी को बिल्कुल भी पसंद न था। उसकी पत्नी तो किसी को एक दमड़ी देकर भी खुश न थी।
गुरुवार व्रत कथा | मनवांछित फल दायक उपवास


एक बार जब वह सौदागर माल से जहाज को भरकर किसी दूसरे देश को गया हुआ था तो पीछे से बृहस्पति देवता साधु का रूप धारण कर उसकी कंजूस पत्नी के पास पहुंचे और भिक्षा की याचना की। उस व्यापारी की पत्नी ने बृहस्पति देवता से कहा महात्मा जी ! "में तो दान पुण्य से बहुत तंग आ गई। मेरा पति सारा धन दान पुण्य में व्यर्थ ही नष्ट करता हैं। आप कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे हमारा सारा धन नष्ट हो जाए। इससे न तो धन लुटेगा और न ही मुझे दुख होगा।"
बृहस्पति देवता ने कहा 'देवी ! तुम बड़ी विचित्र हो। धन और संतान तो सभी चाहते है। पुत्र और लक्ष्मी तो पापी के घर में भी होनी चाहिए। यदि तुम्हारे पास बहुत धन है तो तुम दिल खोलकर दान पुण्य के कार्य करो। भूखों को भोजन खिलाओ, प्यासो को पानी पिलाओ, यात्रियों के लिए धर्मशालाएं बनवाओ,कितनी ही निर्धनों की विवाह योग्य कन्याए धन के अभाव में कुंवारी बैठी है, उनका विवाह संपन्न करवाओ। इसके अतिरिक्त भी बहुत से अनेक पुण्य कार्य है, जिनको करके तुम्हारा लोक परलोक सार्थक हो सकता है।" लेकिन व्यापारी की स्त्री बड़ी ढीठ थी। उसने कहा "महात्मा जी ! मैं इस विषय में आपकी कोई भी बात नही सुनना चाहती, मुझे ऐसे धन की कोई आवश्कता नही जो में दूसरो को बांटती रहूं।


बृहस्पति देवता बोले यदि "यदि तुम्हारी ऐसी ही इच्छा हैं तो फिर ऐसा ही होगा। तुम सात बृहस्पतिवार गोबर से घर लीपकर पीली मिट्टी से अपने बालों को धोना, भोजन में मांस मदिरा ग्रहण करना, कपड़े धोना, बस तुम्हारा सारा धन नष्ट हो जायेगा।" इतना कहकर बृहस्पति देवता अंतर्ध्यान हो गए।
उस औरत ने बृहस्पति देवता के कहे अनुसार वैसा ही करने का निश्चय किया। केवल छः बृहस्पतिवार बीतने पर ही उस औरत का सारा धन नष्ट हो गया और वह स्वयं भी परलोक सिधार गई। उधर माल से भरा उसके पति का जहाज समुंद्र में डूब गया और उसने बड़ी मुश्किल से लकड़ी के तख्तों पर बैठकर अपनी जान बचाई। वह रोता धोता अपने नगर में वापिस पहुंचा। वहां आकर उसने देखा कि उसका सब कुछ नष्ट हो गया है। उस व्यापारी ने अपनी पुत्री से सब समाचार पूछा। लड़की ने पिता को उस साधु (बृहस्पति देवता) वाली पूरी कहानी सुना दी। उसने पुत्री को शांत किया। अब वह प्रति दिन सुबह जंगल में जाकर वहां से लकड़ियां चुन लाता और उन्हें नगर में बेचकर अपनी आजीविका चलाने लगा मगर उसका गुजर बसर बहुत ही मुश्किल से होता था।


एक दिन उसकी पुत्री ने दही खाने की इच्छा प्रकट की। लेकिन उस व्यापारी के पास एक भी पैसा नही था कि वह अपनी पुत्री को दही लाकर देता। लकड़हारा अपनी पुत्री को आश्वासन देकर जंगल मैं जाकर एक वृक्ष के नीचे बैठकर अपनी पूर्व दशा को विचार कर रोने लगा। वह गुरुवार का दिन था। बृहस्पति देवता उसकी यह अवस्था देखकर साधु का रूप धारण कर उस व्यापारी के पास आ पहुंचे और कहने लगे "हे लकड़हारे! तू जंगल में किस चिंता में बैठा है।" व्यापारी ने उतर दिया "महाराज! आप सब कुछ जानने वाले है।" इतना कहकर उसने रुंधे गले और भीगी आंखों से बृहस्पति देवता को अपनी सारी आपबीती सुना दी।
बृहस्पति देवता ने कहा- "भाई, तुम्हारी पत्नी ने गुरुवार के दिन भगवान का अपमान किया था, इसी कारण तुम्हारा यह हाल हुआ हैं, लेकिन अब तुम किसी प्रकार की चिंता न करो। भगवान तुम्हें पहले से भी अधिक धनवान करेंगे। तुम मेरे कहे अनुसार गुरुवार के दिन बृहस्पति देव का पाठ किया करो। दो पैसे के चने और मुनक्का मंगवाकर जल के लोटे में थोड़ी से शक्कर डालकर वह अमृत और प्रसाद परिवार के सब सदस्यों और कथा सुनने वालों में बांट दो, और खुद भी अमृत पान किया करो तथा प्रसाद खाया करो तो भगवान तुम्हारी सब मनोकामनाएं पूर्ण करेंगे।"


साधु को प्रसन्न देखकर उस व्यापारी ने कहा- "महाराज! मुझे लकड़ियों में से इतना भी लाभ नहीं कि दो पैसे की दही लाकर भी अपनी इकलौती कन्या को खिला पाऊं, उसको मैं हर रोज झूठा आश्वासन देकर टालता आता हूं।" बृहस्पति देवता ने कहा-"भक्तराज, तुम चिंता मत करो। आगामी गुरुवार के दिन तुम शहर में लकड़ियां बेचने के लिए जाना, तुमको उस दिन लकड़ियों के चार पैसे अधिक मिलेंगे। जिसमे से तुम दो पैसे का दही लाकर अपनी पुत्री को खिलाना और दो पैसे की मुनक्का और चने लाकर गुरुवार देवता की कथा करना। जल में जरा सी शक्कर डालकर अमृत बनाना और कथा का प्रसाद सब मैं बांटना और खुद भी खाना तो तुम्हारे सारे कार्य सिद्ध हो जायेंगे। इतना कहकर बृहस्पति देवता अंतर्ध्यान हो गए।
गुरुवार के दिन उस व्यापारी ने जंगल में से लकड़ियां इकठ्ठी की और शहर में बेचने के लिए गया। उसको इस दिन चार पैसे अधिक मिले, जिसमे से दो पैसे की दही लाकर उसने अपनी लड़की को दे दी और दो पैसे के चने और मुनक्का लेकर और अमृत बनाकर प्रसाद बांटा और प्रेम से खाया। उसी दिन से उसकी सब कठिनाइयां दूर होने लगी। परंतु अगले गुरुवार को वह बृहस्पति देवता की कथा करना भूल गया।
शुक्रवार को उस नगर के राजा ने आज्ञा दी कि कल मैंने एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन करवाया है। इस लिए कोई भी व्यक्ति अपने घर में अग्नि न जलाएं और समस्त जनता मेरे यहां आकर भोजन करें। जो इस आदेश की अवलेहना करेगा, उसे सूली पर लटका दिया जायेगा।
 राजा की आज्ञानुसार सभी लोग राजा के महल में भोजन करने गए लेकिन वह व्यापारी और उसकी लड़की तनिक विलंब से पहुंचे। और राजा ने उन दोनो को अपने महल के अंदर ले जाकर भोजन करवाया।जब वह पिता पुत्री भोजन करके वापिस आ गए तो महारानी की दृष्टि  उस खूंटी पर पड़ी जिस पर नौलखा हार टंगा हुआ था। उस खूंटी पर अब हार नहीं था। महारानी को विश्वास हो गया कि उसका हार लकड़हारा और उसकी लड़की ही लेकर गए है। फौरन सैनिकों को बुलाकर दोनो बाप बेटी को कैद करवाकर जेल मैं डाल दिया गया।
कैदखाने में पड़कर बाप- बेटी दोनों अत्यंत दुखी हुए। वहां उन्होंने बृहस्पति देवता का स्मरण किया। बृहस्पति देवता वही प्रकट हो गए और व्यापारी से कहने लगे -"भक्तराज! तुम पिछले सप्ताह बृहस्पति देवता की कथा करना भूल गए थे, इसलिए तुम्हारा यह हाल हो गया हैं। परंतु तुम  किसी प्रकार की चिंता न करो। बृहस्पति वार के दिन कैदखाने के दरवाजे पर तुम्हे दो पैसे पड़े दिखाई देंगे। तुम वह पैसे उठाकर चने और मुनक्का मंगवा लेना और विधि पूर्वक बृहस्पति देवता का पूजन करना, तुम्हारे सारे दुःख दूर हो जाएंगे।"
बृहस्पति वार के दिन उस व्यापारी को जेल के मुख्य द्वार के पास दो पैसे पड़े हुए मिले। बाहर सड़क पर एक स्त्री जा रही थी। व्यापारी ने उसे बुलाकर कहा कि वह बाजार से उसे दो पैसे के चने मुनक्का ला दे ताकि में बृहस्पति देवता की कथा कर सकूं। इस पर उस स्त्री ने कहा- "आज मेरे बेटे का विवाह है और में अपने बेटे -बहू के लिए कपड़े सिलवाने जा रही हूं। में बृहस्पति भगवान को क्या जानूं।" इतना कहकर वह औरत वहां से चली गई।
थोड़ी देर के बाद वहां से एक स्त्री निकली। व्यापारी ने उस स्त्री को बुलाकर प्रार्थना की- "बहन! तुम मुझे बाजार से दो पैसे के चने और मुनक्का ला दो। मुझे बृहस्पति वार की कथा करनी है।" वह स्त्री बृहस्पति देवता का नाम सुनकर बोली -"बलिहारी जाऊं वीर भगवान के नाम पर, मैं तुम्हे अभी मुनक्का और चने लाकर देती हूं। मेरा इकलौता बेटा मर गया है। में उसके लिए कफ़न लेने जा रही थी, मगर अब पहले तुम्हारा काम करूंगी, उसके बाद बेटे के लिए कफ़न लाऊंगी।" उस स्त्री ने व्यापारी से दो पैसे लिए और बाजार से चने और मुनक्का के आई और स्वयं भी बृहस्पति देवता की कथा सुनी। 
कथा समाप्त होने के बाद वह स्त्री वह स्त्री अपने पुत्र के लिए कफ़न लेकर अपने घर के लिए रवाना हुई तो क्या देखती है कि लोग उसके बेटे की लाश को "राम नाम सत्य है" कहते हुए शमशान की और ले जा रहे है। उस स्त्री ने इन लोगो से कहा -" भाई, मुझे अपने लाडले बेटे का मुख तो देख लेने दो। लोगो ने अर्थी को जमीन पर रख दिया। तब उस स्त्री ने अपने मृत पुत्र के मुख में प्रसाद और अमृत डाला। प्रसाद और अमृत के मुख में पड़ने के साथ ही उसका पुत्र उठ खड़ा हुआ और अपनी माता को गले लगकर मिला।
दूसरी स्त्री जिसने बृहस्पति देवता का निरादर किया था,  जब वह बाजार से अपने पुत्र के विवाह के लिए कपड़े लेकर वापिस लौटी और उसका पुत्र नए कपड़े डालकर घोड़ी पर बैठकर बारात में निकला तो घोड़ी ने ऐसी छलांग मारी कि वह जमीन पर आ गिरा और बुरी तरह से घायल हो गया और कुछ ही क्षण के पश्चात मर गया। तब वह स्त्री रो-रोकर बृहस्पति देवता से कहने लगी- " हे देव, मेरा अपराध क्षमा करो, मेरा अपराध क्षमा करो।" उसकी प्रार्थना सुनकर भगवान बृहस्पति साधु का रूप धारण करके वहां आए और उस स्त्री से कहने लगे- "देवी! अधिक विलाप करने की कोई आवश्कता नही। तुमने गुरुवार देवता का निरादर किया था जिसका परिणाम तुम्हे मिला है। तुम
जेलखाने जाकर भक्त से क्षमा याचना करो। उससे सब कुछ ठीक हो जायेगा।"
वह स्त्री फिर जेलखाने पहुंचीं और मुख्य द्वार के पास जाकर उस व्यापारी से हाथ जोड़कर कहने लगी- "भक्तराज! मैंने तुम्हारा कहा नहीं माना। मुनक्का और चने लाकर तुम्हे नही दिए, इससे गुरुवार देवता मुझे नाराज हो गए, जिसके कारण मेरा इकलौता लड़का घोड़ी से गिरकर मर गया।" व्यापारी ने कहा -"माता तू चिंता मत कर। बृहस्पति देवता सब कल्याण करेंगे। तुम अगले गुरुवार को आकर बृहस्पति देवता की कथा सुनना। तब तक अपने पुत्र के शव को फूल, इत्र,घी आदि सुगंधित पदार्थो में रख दो।"
उस स्त्री ने ऐसा ही किया। बृहस्पति का दिन भी आ पहुंचा। वह दो पैसे के मुनक्का और चने लेकर तथा पवित्र जल का लोटा भरकर जेल के द्वार पर आई और श्रद्धा के साथ व्यापारी और उसकी पुत्री के साथ  बृहस्पति देवता की कथा सुनी। जब कथा समाप्त हुई तो वह अमृत और प्रसाद लाकर अपने मृत पुत्र के मुख में डाला। अचानक उसकी सांस आने लगी वह उठकर खड़ा हो गया। पुत्र को लेकर वह महिला खुशी से अपने घर को रवाना हुई और बृहस्पति देवता के गुण गाने लगी।
उसी दिन रात्रि में राजा को बृहस्पति देवता ने स्वप्न में दर्शन दिए और कहा- "हे राजन तूने जिस व्यापारी और उसकी पुत्री को जेल में बंद कर रखा है, वे दोनो निर्दोष है। अब दिन निकलने के साथ ही दोनो को रिहा कर दे। तेरी रानी का नौलखा हार उसी खूंटी पर लटका है।"
दिन निकला तो रानी ने अपना नौलखा हार उसी खूंटी पर लटका देखा। राजा ने उस व्यापारी और उसकी पुत्री को जेल से रिहा कर अपने अपराध के लिए उनसे क्षमा मांगी और उसको अपना आधा राज्य देकर तथा उसकी पुत्री का उच्च कुल में विवाह कर दहेज में हीरे- जवाहरात दिए।
बृहस्पति देवता ऐसे ही है। जिसकी जैसी मनोकामना होती है, वो पूर्ण करते है। इस व्रत को करने से व्यक्ति रोगमुक्त व निर्धन धनवान होता है, निपुत्र पुत्रवान होता है। यश व ऐश्वर्य की वृद्धि होती है। जीवन सुखमय होता है। मन की चिंताएं भी दूर होती है। जो कोई भी श्रद्धा, विश्वास और प्रेम से बृहस्पति देवता की कथा पढ़ेगा या दूसरों को पढ़कर सुनाएगा, उसकी सब इच्छाएं पूरी होंगी।

    बृहस्पतिवार की दूसरी कथा

एक दिन देवराज इंद्र अहंकार पूर्वक अपने सिंहासन पर बैठे थे और बहुत से देवता, ऋषि, गंधर्व, किन्नर आदि इस सभा में उपस्थित थे। उसी समय देवगुरु बृहस्पति वहां पधारे परंतु इंद्रदेव ने उन्हें यथोचित सम्मान नही दिया और बृहस्पति देव इसे अपना अनादर समझ कर वहां से उठकर चले गए। तब इंद्र को बड़ा दुःख हुआ कि देखो मैंने गुरुजी का अनादर कर दिया। मुझसे बड़ी भारी भूल हो गई। गुरुजी के आशीर्वाद से ही मुझको यह वैभव मिला है। उनके क्रोध से यह सब नष्ट हो जायेगा। इसलिए मुझे उनके पास जाकर ही उनसे क्षमा याचना करनी चाहिए, जिससे उनका क्रोध शांत हो जाए और मेरा कल्याण हो। ऐसा विचार कर इंद्र बृहस्पति देव के आश्रम पर गए।
बृहस्पति देव ने अपने योग बल से यह जान लिया कि इंद्र क्षमा मांगने के लिए उनके आश्रम पर आ रहा है, तब क्रोधवश उससे भेंट करना उचित न समझ वे अंतर्ध्यान हो गए। जब इंद्र ने ब्रहस्पति देव को आश्रम में न देखा तो वह निराश होकर लौट आया। जब दैत्यों के राजा वृष वर्मा को यह समाचार विदित हुआ तो उसने अपने गुरु शुक्राचार्य की आज्ञा से इंद्रपुरी को चारो तरफ़ से घेर लिया। गुरु की कृपा न होने के कारण देवता हारने व मार खाने लगे।
तब देवताओं ने जाकर ब्रह्मा जी को विनयपूर्वक सब वृतांत सुनाया और निवेदन किया कि महाराज दैत्यों से किसी प्रकार हमारी रक्षा कीजिए। ब्रह्मा जी ने कहा- "तुमने बड़ा अपराध किया है जो गुरुदेव को क्रोधित कर दिया। त्वष्टा ऋषि के पुत्र विश्वरूपा बड़े तपस्वी और ज्ञानी है। उन्हें अपना पुरोहित बनाओ, तभी तुम्हारा कल्याण हो सकता है।" यह वचन सुनते ही इंद्र त्वष्टा ऋषि के पास गए और विनीत भाव से कहने लगे कि "आप हमारे पुरोहित बन जाएं जिससे हमारा कल्याण हो।" त्वष्टा ऋषि ने उत्तर दिया कि "पुरोहित बनने से तपोबल घट जाता है परंतु तुम बहुत विनती करते हो तो मेरा पुत्र विश्वरूपा पुरोहित बनकर तुम्हारी रक्षा करेगा।"
विश्वरूपा ने पिता की आज्ञा से पुरोहित बनकर ऐसा यत्न किया कि हरि इच्छा से इंद्र वृष वर्मा को युद्ध में जीतकर इंद्रासन पर विराजमान हुए। विश्वरूपा के तीन मुख थे। एक मुख से वह सोमपल्ली लता का रस निकालकर पीते, दूसरे मुख से मदिरा पीते और तीसरे मुख से अन्न आदि भोजन करते। कुछ दिन के उपरांत इंद्र ने विश्वरूपा से कहा कि में आपकी आज्ञा से यज्ञ करना चाहता हूं।
विश्वरूपा की आज्ञानुसार यज्ञ आरंभ हो गया। एक दैत्य ने विश्वरूपा से आकर कहा कि तुम्हारी माता दैत्य की कन्या है। इस कारण दैत्यों के कल्याण के निमित्त भी एक आहुति दैत्यों के नाम पर दे दिया करो।
विश्वरूपा उस दैत्य का कहा मानकर आहुति देते समय दैत्यों का नाम भी धीरे से लेने लगा। इसी कारण यज्ञ करने से देवताओं का तेज नही बढ़ा । इंद्र ने वह वृतांत जानते ही क्रोधित होकर विश्वरूपा के तीनों सिर काट डाले। मद्यपान करने वाले सिर से भंवरा, सोमपल्ली पीने वाले सिर से कबूतर और अन्न खाने वाले सिर से तीतर बन गया।
विश्वरूपा के मरते ही इंद्र  का स्वरूप ब्रह्महत्या के प्रभाव से बदल गया। देवताओं द्वारा एक वर्ष तक पश्चाताप करने पर भी ब्रह्महत्या का प्रभाव न छूटा तो सब देवताओं के प्रार्थना करने पर ब्रह्मा जी बृहस्पति देवता सहित वहां आए।
उस ब्रह्महत्या के चार भाग किए। उनमें से एक भाग पृथ्वी को दिया। इसी कारण कही धरती ऊंची तो कहीं नीची और कहीं धरती बीज बोने के लायक भी नहीं होती। साथ ही ब्रह्मा जी ने यह वरदान भी धरती माता को दिया कि पृथ्वी में अगर कही गड्ढा होगा तो कुछ समय पाकर वह स्वयं ही भर जाएगा। ब्रह्महत्या का दूसरा भाग वृक्षों को दिया जिससे उनमें से गोंद बनकर बहता है। इस कारण गूगल के अतिरिक्त सभी गोंद अशुभ समझे जाते है। वृक्षों को यह वरदान दिया कि ऊपर से सुख जाने पर भी जड़ फिर से फूट जायेगी।
ब्रह्महत्या का तीसरा भाग स्त्रियों को दिया, इसी कारण स्त्रियां हर महीने रजस्वला होकर पहले दिन चांडालनी, दूसरे दिन ब्रह्मघाटिनी और तीसरे दिन धोबिन के समान रहकर चौथे दिन शुद्ध होती है। साथ ही उनको संतान प्राप्ति का वरदान दिया। ब्रह्महत्या का चौथा भाग जल को दिया जिससे फेन और सीवाल आदि जल के ऊपर आ जाते है। जल को यह वरदान मिला कि जल को जिस चीज में डाला जायेगा, वह बोझ में बढ़ जाएगी। इस प्रकार इंद्र को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त किया।
जो मनुष्य इस कथा को पढ़ता या सुनता है, उसके सब पाप बृहस्पति जी महाराज की कृपा से नष्ट हो जाते है।

        ब्रहस्पतिवार (गुरुवार) की आरती

ॐ जय बृहस्पति देवा ॐ जय बृहस्पति देवा
छिन छिन भोग लगाऊं, कदली फल मेवा। ॐ
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी
जगत पिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी। ॐ
चरणामृत निज निर्मल सब पातक हर्ता
सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता। ॐ
तन, मन, धन अर्पण कर जो जन शरण पड़े
प्रभु प्रकट होकर, आकर द्वार खड़े। ॐ
दीनदयालु, दयानिधि, भक्तन हितकारी
पाप,दोष सब हर्त्ता, भव बंधन हारी। ॐ
सकल मनोरथ दायक,सब संशय हारी
विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी। ॐ
जो कोई आरती तेरी प्रेम सहित गावे,
ज्येष्टानंद आनंदकर, सो निश्चय पावे। ॐ
सब प्रेम से बोलिए विष्णु भगवान की जय
बोलो देवगुरु बृहस्पतिदेव जी महाराज की जय


                 
                 



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें