गुरुवार व्रत कथा | मनवांछित फल दायक उपवास

      गुरुवार की व्रत कथा

एक नगर में एक बड़ा व्यापारी रहा करता था। वह जहाज में माल लदवा कर दूसरे देशों को भेजा करता था और खुद भी जहाजों के साथ दूर-दूर के देशों को जाया करता था। इस तरह वह खूब धन कमाकर लाता था। उसकी गृहस्थी बड़े मजे से चल रही थी। वह दान पुण्य भी खूब दिल खोलकर करता था। परंतु उसका इस तरह से दान देना उसकी पत्नी को बिल्कुल भी पसंद न था। उसकी पत्नी तो किसी को एक दमड़ी देकर भी खुश न थी।
गुरुवार व्रत कथा | मनवांछित फल दायक उपवास


एक बार जब वह सौदागर माल से जहाज को भरकर किसी दूसरे देश को गया हुआ था तो पीछे से बृहस्पति देवता साधु का रूप धारण कर उसकी कंजूस पत्नी के पास पहुंचे और भिक्षा की याचना की। उस व्यापारी की पत्नी ने बृहस्पति देवता से कहा महात्मा जी ! "में तो दान पुण्य से बहुत तंग आ गई। मेरा पति सारा धन दान पुण्य में व्यर्थ ही नष्ट करता हैं। आप कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे हमारा सारा धन नष्ट हो जाए। इससे न तो धन लुटेगा और न ही मुझे दुख होगा।"
बृहस्पति देवता ने कहा 'देवी ! तुम बड़ी विचित्र हो। धन और संतान तो सभी चाहते है। पुत्र और लक्ष्मी तो पापी के घर में भी होनी चाहिए। यदि तुम्हारे पास बहुत धन है तो तुम दिल खोलकर दान पुण्य के कार्य करो। भूखों को भोजन खिलाओ, प्यासो को पानी पिलाओ, यात्रियों के लिए धर्मशालाएं बनवाओ,कितनी ही निर्धनों की विवाह योग्य कन्याए धन के अभाव में कुंवारी बैठी है, उनका विवाह संपन्न करवाओ। इसके अतिरिक्त भी बहुत से अनेक पुण्य कार्य है, जिनको करके तुम्हारा लोक परलोक सार्थक हो सकता है।" लेकिन व्यापारी की स्त्री बड़ी ढीठ थी। उसने कहा "महात्मा जी ! मैं इस विषय में आपकी कोई भी बात नही सुनना चाहती, मुझे ऐसे धन की कोई आवश्कता नही जो में दूसरो को बांटती रहूं।


बृहस्पति देवता बोले यदि "यदि तुम्हारी ऐसी ही इच्छा हैं तो फिर ऐसा ही होगा। तुम सात बृहस्पतिवार गोबर से घर लीपकर पीली मिट्टी से अपने बालों को धोना, भोजन में मांस मदिरा ग्रहण करना, कपड़े धोना, बस तुम्हारा सारा धन नष्ट हो जायेगा।" इतना कहकर बृहस्पति देवता अंतर्ध्यान हो गए।
उस औरत ने बृहस्पति देवता के कहे अनुसार वैसा ही करने का निश्चय किया। केवल छः बृहस्पतिवार बीतने पर ही उस औरत का सारा धन नष्ट हो गया और वह स्वयं भी परलोक सिधार गई। उधर माल से भरा उसके पति का जहाज समुंद्र में डूब गया और उसने बड़ी मुश्किल से लकड़ी के तख्तों पर बैठकर अपनी जान बचाई। वह रोता धोता अपने नगर में वापिस पहुंचा। वहां आकर उसने देखा कि उसका सब कुछ नष्ट हो गया है। उस व्यापारी ने अपनी पुत्री से सब समाचार पूछा। लड़की ने पिता को उस साधु (बृहस्पति देवता) वाली पूरी कहानी सुना दी। उसने पुत्री को शांत किया। अब वह प्रति दिन सुबह जंगल में जाकर वहां से लकड़ियां चुन लाता और उन्हें नगर में बेचकर अपनी आजीविका चलाने लगा मगर उसका गुजर बसर बहुत ही मुश्किल से होता था।


एक दिन उसकी पुत्री ने दही खाने की इच्छा प्रकट की। लेकिन उस व्यापारी के पास एक भी पैसा नही था कि वह अपनी पुत्री को दही लाकर देता। लकड़हारा अपनी पुत्री को आश्वासन देकर जंगल मैं जाकर एक वृक्ष के नीचे बैठकर अपनी पूर्व दशा को विचार कर रोने लगा। वह गुरुवार का दिन था। बृहस्पति देवता उसकी यह अवस्था देखकर साधु का रूप धारण कर उस व्यापारी के पास आ पहुंचे और कहने लगे "हे लकड़हारे! तू जंगल में किस चिंता में बैठा है।" व्यापारी ने उतर दिया "महाराज! आप सब कुछ जानने वाले है।" इतना कहकर उसने रुंधे गले और भीगी आंखों से बृहस्पति देवता को अपनी सारी आपबीती सुना दी।
बृहस्पति देवता ने कहा- "भाई, तुम्हारी पत्नी ने गुरुवार के दिन भगवान का अपमान किया था, इसी कारण तुम्हारा यह हाल हुआ हैं, लेकिन अब तुम किसी प्रकार की चिंता न करो। भगवान तुम्हें पहले से भी अधिक धनवान करेंगे। तुम मेरे कहे अनुसार गुरुवार के दिन बृहस्पति देव का पाठ किया करो। दो पैसे के चने और मुनक्का मंगवाकर जल के लोटे में थोड़ी से शक्कर डालकर वह अमृत और प्रसाद परिवार के सब सदस्यों और कथा सुनने वालों में बांट दो, और खुद भी अमृत पान किया करो तथा प्रसाद खाया करो तो भगवान तुम्हारी सब मनोकामनाएं पूर्ण करेंगे।"


साधु को प्रसन्न देखकर उस व्यापारी ने कहा- "महाराज! मुझे लकड़ियों में से इतना भी लाभ नहीं कि दो पैसे की दही लाकर भी अपनी इकलौती कन्या को खिला पाऊं, उसको मैं हर रोज झूठा आश्वासन देकर टालता आता हूं।" बृहस्पति देवता ने कहा-"भक्तराज, तुम चिंता मत करो। आगामी गुरुवार के दिन तुम शहर में लकड़ियां बेचने के लिए जाना, तुमको उस दिन लकड़ियों के चार पैसे अधिक मिलेंगे। जिसमे से तुम दो पैसे का दही लाकर अपनी पुत्री को खिलाना और दो पैसे की मुनक्का और चने लाकर गुरुवार देवता की कथा करना। जल में जरा सी शक्कर डालकर अमृत बनाना और कथा का प्रसाद सब मैं बांटना और खुद भी खाना तो तुम्हारे सारे कार्य सिद्ध हो जायेंगे। इतना कहकर बृहस्पति देवता अंतर्ध्यान हो गए।
गुरुवार के दिन उस व्यापारी ने जंगल में से लकड़ियां इकठ्ठी की और शहर में बेचने के लिए गया। उसको इस दिन चार पैसे अधिक मिले, जिसमे से दो पैसे की दही लाकर उसने अपनी लड़की को दे दी और दो पैसे के चने और मुनक्का लेकर और अमृत बनाकर प्रसाद बांटा और प्रेम से खाया। उसी दिन से उसकी सब कठिनाइयां दूर होने लगी। परंतु अगले गुरुवार को वह बृहस्पति देवता की कथा करना भूल गया।
शुक्रवार को उस नगर के राजा ने आज्ञा दी कि कल मैंने एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन करवाया है। इस लिए कोई भी व्यक्ति अपने घर में अग्नि न जलाएं और समस्त जनता मेरे यहां आकर भोजन करें। जो इस आदेश की अवलेहना करेगा, उसे सूली पर लटका दिया जायेगा।
 राजा की आज्ञानुसार सभी लोग राजा के महल में भोजन करने गए लेकिन वह व्यापारी और उसकी लड़की तनिक विलंब से पहुंचे। और राजा ने उन दोनो को अपने महल के अंदर ले जाकर भोजन करवाया।जब वह पिता पुत्री भोजन करके वापिस आ गए तो महारानी की दृष्टि  उस खूंटी पर पड़ी जिस पर नौलखा हार टंगा हुआ था। उस खूंटी पर अब हार नहीं था। महारानी को विश्वास हो गया कि उसका हार लकड़हारा और उसकी लड़की ही लेकर गए है। फौरन सैनिकों को बुलाकर दोनो बाप बेटी को कैद करवाकर जेल मैं डाल दिया गया।
कैदखाने में पड़कर बाप- बेटी दोनों अत्यंत दुखी हुए। वहां उन्होंने बृहस्पति देवता का स्मरण किया। बृहस्पति देवता वही प्रकट हो गए और व्यापारी से कहने लगे -"भक्तराज! तुम पिछले सप्ताह बृहस्पति देवता की कथा करना भूल गए थे, इसलिए तुम्हारा यह हाल हो गया हैं। परंतु तुम  किसी प्रकार की चिंता न करो। बृहस्पति वार के दिन कैदखाने के दरवाजे पर तुम्हे दो पैसे पड़े दिखाई देंगे। तुम वह पैसे उठाकर चने और मुनक्का मंगवा लेना और विधि पूर्वक बृहस्पति देवता का पूजन करना, तुम्हारे सारे दुःख दूर हो जाएंगे।"
बृहस्पति वार के दिन उस व्यापारी को जेल के मुख्य द्वार के पास दो पैसे पड़े हुए मिले। बाहर सड़क पर एक स्त्री जा रही थी। व्यापारी ने उसे बुलाकर कहा कि वह बाजार से उसे दो पैसे के चने मुनक्का ला दे ताकि में बृहस्पति देवता की कथा कर सकूं। इस पर उस स्त्री ने कहा- "आज मेरे बेटे का विवाह है और में अपने बेटे -बहू के लिए कपड़े सिलवाने जा रही हूं। में बृहस्पति भगवान को क्या जानूं।" इतना कहकर वह औरत वहां से चली गई।
थोड़ी देर के बाद वहां से एक स्त्री निकली। व्यापारी ने उस स्त्री को बुलाकर प्रार्थना की- "बहन! तुम मुझे बाजार से दो पैसे के चने और मुनक्का ला दो। मुझे बृहस्पति वार की कथा करनी है।" वह स्त्री बृहस्पति देवता का नाम सुनकर बोली -"बलिहारी जाऊं वीर भगवान के नाम पर, मैं तुम्हे अभी मुनक्का और चने लाकर देती हूं। मेरा इकलौता बेटा मर गया है। में उसके लिए कफ़न लेने जा रही थी, मगर अब पहले तुम्हारा काम करूंगी, उसके बाद बेटे के लिए कफ़न लाऊंगी।" उस स्त्री ने व्यापारी से दो पैसे लिए और बाजार से चने और मुनक्का के आई और स्वयं भी बृहस्पति देवता की कथा सुनी। 
कथा समाप्त होने के बाद वह स्त्री वह स्त्री अपने पुत्र के लिए कफ़न लेकर अपने घर के लिए रवाना हुई तो क्या देखती है कि लोग उसके बेटे की लाश को "राम नाम सत्य है" कहते हुए शमशान की और ले जा रहे है। उस स्त्री ने इन लोगो से कहा -" भाई, मुझे अपने लाडले बेटे का मुख तो देख लेने दो। लोगो ने अर्थी को जमीन पर रख दिया। तब उस स्त्री ने अपने मृत पुत्र के मुख में प्रसाद और अमृत डाला। प्रसाद और अमृत के मुख में पड़ने के साथ ही उसका पुत्र उठ खड़ा हुआ और अपनी माता को गले लगकर मिला।
दूसरी स्त्री जिसने बृहस्पति देवता का निरादर किया था,  जब वह बाजार से अपने पुत्र के विवाह के लिए कपड़े लेकर वापिस लौटी और उसका पुत्र नए कपड़े डालकर घोड़ी पर बैठकर बारात में निकला तो घोड़ी ने ऐसी छलांग मारी कि वह जमीन पर आ गिरा और बुरी तरह से घायल हो गया और कुछ ही क्षण के पश्चात मर गया। तब वह स्त्री रो-रोकर बृहस्पति देवता से कहने लगी- " हे देव, मेरा अपराध क्षमा करो, मेरा अपराध क्षमा करो।" उसकी प्रार्थना सुनकर भगवान बृहस्पति साधु का रूप धारण करके वहां आए और उस स्त्री से कहने लगे- "देवी! अधिक विलाप करने की कोई आवश्कता नही। तुमने गुरुवार देवता का निरादर किया था जिसका परिणाम तुम्हे मिला है। तुम
जेलखाने जाकर भक्त से क्षमा याचना करो। उससे सब कुछ ठीक हो जायेगा।"
वह स्त्री फिर जेलखाने पहुंचीं और मुख्य द्वार के पास जाकर उस व्यापारी से हाथ जोड़कर कहने लगी- "भक्तराज! मैंने तुम्हारा कहा नहीं माना। मुनक्का और चने लाकर तुम्हे नही दिए, इससे गुरुवार देवता मुझे नाराज हो गए, जिसके कारण मेरा इकलौता लड़का घोड़ी से गिरकर मर गया।" व्यापारी ने कहा -"माता तू चिंता मत कर। बृहस्पति देवता सब कल्याण करेंगे। तुम अगले गुरुवार को आकर बृहस्पति देवता की कथा सुनना। तब तक अपने पुत्र के शव को फूल, इत्र,घी आदि सुगंधित पदार्थो में रख दो।"
उस स्त्री ने ऐसा ही किया। बृहस्पति का दिन भी आ पहुंचा। वह दो पैसे के मुनक्का और चने लेकर तथा पवित्र जल का लोटा भरकर जेल के द्वार पर आई और श्रद्धा के साथ व्यापारी और उसकी पुत्री के साथ  बृहस्पति देवता की कथा सुनी। जब कथा समाप्त हुई तो वह अमृत और प्रसाद लाकर अपने मृत पुत्र के मुख में डाला। अचानक उसकी सांस आने लगी वह उठकर खड़ा हो गया। पुत्र को लेकर वह महिला खुशी से अपने घर को रवाना हुई और बृहस्पति देवता के गुण गाने लगी।
उसी दिन रात्रि में राजा को बृहस्पति देवता ने स्वप्न में दर्शन दिए और कहा- "हे राजन तूने जिस व्यापारी और उसकी पुत्री को जेल में बंद कर रखा है, वे दोनो निर्दोष है। अब दिन निकलने के साथ ही दोनो को रिहा कर दे। तेरी रानी का नौलखा हार उसी खूंटी पर लटका है।"
दिन निकला तो रानी ने अपना नौलखा हार उसी खूंटी पर लटका देखा। राजा ने उस व्यापारी और उसकी पुत्री को जेल से रिहा कर अपने अपराध के लिए उनसे क्षमा मांगी और उसको अपना आधा राज्य देकर तथा उसकी पुत्री का उच्च कुल में विवाह कर दहेज में हीरे- जवाहरात दिए।
बृहस्पति देवता ऐसे ही है। जिसकी जैसी मनोकामना होती है, वो पूर्ण करते है। इस व्रत को करने से व्यक्ति रोगमुक्त व निर्धन धनवान होता है, निपुत्र पुत्रवान होता है। यश व ऐश्वर्य की वृद्धि होती है। जीवन सुखमय होता है। मन की चिंताएं भी दूर होती है। जो कोई भी श्रद्धा, विश्वास और प्रेम से बृहस्पति देवता की कथा पढ़ेगा या दूसरों को पढ़कर सुनाएगा, उसकी सब इच्छाएं पूरी होंगी।

    बृहस्पतिवार की दूसरी कथा

एक दिन देवराज इंद्र अहंकार पूर्वक अपने सिंहासन पर बैठे थे और बहुत से देवता, ऋषि, गंधर्व, किन्नर आदि इस सभा में उपस्थित थे। उसी समय देवगुरु बृहस्पति वहां पधारे परंतु इंद्रदेव ने उन्हें यथोचित सम्मान नही दिया और बृहस्पति देव इसे अपना अनादर समझ कर वहां से उठकर चले गए। तब इंद्र को बड़ा दुःख हुआ कि देखो मैंने गुरुजी का अनादर कर दिया। मुझसे बड़ी भारी भूल हो गई। गुरुजी के आशीर्वाद से ही मुझको यह वैभव मिला है। उनके क्रोध से यह सब नष्ट हो जायेगा। इसलिए मुझे उनके पास जाकर ही उनसे क्षमा याचना करनी चाहिए, जिससे उनका क्रोध शांत हो जाए और मेरा कल्याण हो। ऐसा विचार कर इंद्र बृहस्पति देव के आश्रम पर गए।
बृहस्पति देव ने अपने योग बल से यह जान लिया कि इंद्र क्षमा मांगने के लिए उनके आश्रम पर आ रहा है, तब क्रोधवश उससे भेंट करना उचित न समझ वे अंतर्ध्यान हो गए। जब इंद्र ने ब्रहस्पति देव को आश्रम में न देखा तो वह निराश होकर लौट आया। जब दैत्यों के राजा वृष वर्मा को यह समाचार विदित हुआ तो उसने अपने गुरु शुक्राचार्य की आज्ञा से इंद्रपुरी को चारो तरफ़ से घेर लिया। गुरु की कृपा न होने के कारण देवता हारने व मार खाने लगे।
तब देवताओं ने जाकर ब्रह्मा जी को विनयपूर्वक सब वृतांत सुनाया और निवेदन किया कि महाराज दैत्यों से किसी प्रकार हमारी रक्षा कीजिए। ब्रह्मा जी ने कहा- "तुमने बड़ा अपराध किया है जो गुरुदेव को क्रोधित कर दिया। त्वष्टा ऋषि के पुत्र विश्वरूपा बड़े तपस्वी और ज्ञानी है। उन्हें अपना पुरोहित बनाओ, तभी तुम्हारा कल्याण हो सकता है।" यह वचन सुनते ही इंद्र त्वष्टा ऋषि के पास गए और विनीत भाव से कहने लगे कि "आप हमारे पुरोहित बन जाएं जिससे हमारा कल्याण हो।" त्वष्टा ऋषि ने उत्तर दिया कि "पुरोहित बनने से तपोबल घट जाता है परंतु तुम बहुत विनती करते हो तो मेरा पुत्र विश्वरूपा पुरोहित बनकर तुम्हारी रक्षा करेगा।"
विश्वरूपा ने पिता की आज्ञा से पुरोहित बनकर ऐसा यत्न किया कि हरि इच्छा से इंद्र वृष वर्मा को युद्ध में जीतकर इंद्रासन पर विराजमान हुए। विश्वरूपा के तीन मुख थे। एक मुख से वह सोमपल्ली लता का रस निकालकर पीते, दूसरे मुख से मदिरा पीते और तीसरे मुख से अन्न आदि भोजन करते। कुछ दिन के उपरांत इंद्र ने विश्वरूपा से कहा कि में आपकी आज्ञा से यज्ञ करना चाहता हूं।
विश्वरूपा की आज्ञानुसार यज्ञ आरंभ हो गया। एक दैत्य ने विश्वरूपा से आकर कहा कि तुम्हारी माता दैत्य की कन्या है। इस कारण दैत्यों के कल्याण के निमित्त भी एक आहुति दैत्यों के नाम पर दे दिया करो।
विश्वरूपा उस दैत्य का कहा मानकर आहुति देते समय दैत्यों का नाम भी धीरे से लेने लगा। इसी कारण यज्ञ करने से देवताओं का तेज नही बढ़ा । इंद्र ने वह वृतांत जानते ही क्रोधित होकर विश्वरूपा के तीनों सिर काट डाले। मद्यपान करने वाले सिर से भंवरा, सोमपल्ली पीने वाले सिर से कबूतर और अन्न खाने वाले सिर से तीतर बन गया।
विश्वरूपा के मरते ही इंद्र  का स्वरूप ब्रह्महत्या के प्रभाव से बदल गया। देवताओं द्वारा एक वर्ष तक पश्चाताप करने पर भी ब्रह्महत्या का प्रभाव न छूटा तो सब देवताओं के प्रार्थना करने पर ब्रह्मा जी बृहस्पति देवता सहित वहां आए।
उस ब्रह्महत्या के चार भाग किए। उनमें से एक भाग पृथ्वी को दिया। इसी कारण कही धरती ऊंची तो कहीं नीची और कहीं धरती बीज बोने के लायक भी नहीं होती। साथ ही ब्रह्मा जी ने यह वरदान भी धरती माता को दिया कि पृथ्वी में अगर कही गड्ढा होगा तो कुछ समय पाकर वह स्वयं ही भर जाएगा। ब्रह्महत्या का दूसरा भाग वृक्षों को दिया जिससे उनमें से गोंद बनकर बहता है। इस कारण गूगल के अतिरिक्त सभी गोंद अशुभ समझे जाते है। वृक्षों को यह वरदान दिया कि ऊपर से सुख जाने पर भी जड़ फिर से फूट जायेगी।
ब्रह्महत्या का तीसरा भाग स्त्रियों को दिया, इसी कारण स्त्रियां हर महीने रजस्वला होकर पहले दिन चांडालनी, दूसरे दिन ब्रह्मघाटिनी और तीसरे दिन धोबिन के समान रहकर चौथे दिन शुद्ध होती है। साथ ही उनको संतान प्राप्ति का वरदान दिया। ब्रह्महत्या का चौथा भाग जल को दिया जिससे फेन और सीवाल आदि जल के ऊपर आ जाते है। जल को यह वरदान मिला कि जल को जिस चीज में डाला जायेगा, वह बोझ में बढ़ जाएगी। इस प्रकार इंद्र को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त किया।
जो मनुष्य इस कथा को पढ़ता या सुनता है, उसके सब पाप बृहस्पति जी महाराज की कृपा से नष्ट हो जाते है।

        ब्रहस्पतिवार (गुरुवार) की आरती

ॐ जय बृहस्पति देवा ॐ जय बृहस्पति देवा
छिन छिन भोग लगाऊं, कदली फल मेवा। ॐ
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी
जगत पिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी। ॐ
चरणामृत निज निर्मल सब पातक हर्ता
सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता। ॐ
तन, मन, धन अर्पण कर जो जन शरण पड़े
प्रभु प्रकट होकर, आकर द्वार खड़े। ॐ
दीनदयालु, दयानिधि, भक्तन हितकारी
पाप,दोष सब हर्त्ता, भव बंधन हारी। ॐ
सकल मनोरथ दायक,सब संशय हारी
विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी। ॐ
जो कोई आरती तेरी प्रेम सहित गावे,
ज्येष्टानंद आनंदकर, सो निश्चय पावे। ॐ
सब प्रेम से बोलिए विष्णु भगवान की जय
बोलो देवगुरु बृहस्पतिदेव जी महाराज की जय


                 
                 



Aarti Kunj Bihari Ki | कुंज बिहारी की आरती

कुंज बिहारी जी की आरती गाने का अपना ही महत्व है।  भगवान श्री कृष्ण संग देवी राधा की इस आरती गान से  वातावरण आनंदमय हो जाता है। कुंज बिहारी जी की  आरती गान के समय शंख, घंटी और करताल बजाते    हुए भक्ति भाव से परिवार सहित गाएं।                       
                                                          
Aarti Kunj Bihari Ki

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की           
  
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।                   

श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।

लतन में ठाढ़े बनमाली; भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक,

ललित छवि श्यामा प्यारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की।

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।


गगन सों सुमन रासि बरसै; बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग,

 ग्वालिन संग; 

Aarti Kunj Bihari Ki

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अतुल रति गोप कुमारी की॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा।

स्मरन ते होत मोह भंगा; बसी सिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच

चरन छवि श्रीबनवारी की॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू।चहुं

दिसि गोपि ग्वाल धेनू; हंसत मृदु मंद,चांदनी चंद, कटत भव फंद।।

टेर सुन दीन भिखारी की॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की

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Valentine Week 2022: Day Wise Full Details

History of Valentine Day

वेलेंटाइन डे यानी प्यार का दिन। यह दिन सेंट वेलेंटाइन की याद में लगभग संपूर्ण विश्व में बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है।वेलेंडाइन डे का इंतजार हर प्रेमी जोड़ा शादी से पहले या शादी के बाद पति पत्नी बहुत ही बेसब्री से करते है और अपनी एक दूसरे के प्रति प्रेम भावना का इजहार करते है।

Valentine Week 2022: Day Wise Full Details

ऐसा बताया जाता है कि तीसरी शताब्दी में रोम में सम्राट कलाडियस का शासन था। सम्राट के अनुसार विवाह करने से पुरुषो की शक्तियां और बुद्धि कम हो जाती है। उसने आदेश जारी किया कि उसका कोई भी सैनिक या अधिकारी विवाह नहीं करेगा। संत वेलेंटाइन ने इस आदेश का पुरजोर विरोध किया।
संत वेलेंटाइन के आह्वान पर अनेक सैनिकों और अधिकारियों ने विवाह किया। सम्राट कलाडियस ने इसे अपना अपमान समझा और राज आज्ञा का उलंघन करने के अपराध मैं संत वेलेंटाइन को 14 फरवरी 269 को फांसी पर चढ़वा दिया। तब से ही संत वेलेंटाइन की याद में हर वर्ष 14 फरवरी के दिन वेलेंटाइन डे को प्रेम के प्रतीक के रूप में मनाया जाता हैं।
ऐसा भी बताया जाता है कि सेंट वेलेंटाइन ने अपनी मृत्यु से कुछ पहले  जेलर की नेत्रहीन बेटी जेकॉबस को नेत्रदान किया था और उसे एक पत्र भी लिखा था जिसके अंत में उन्होंने लिखा था "तुम्हारा वेलेंटाइन"। हर साल 14 फरवरी को सेंट वेलेंटाइन की याद में पूरे विश्व में सच्चे और निस्वार्थ प्यार के प्रतीक के रूप मैं वेलेंटाइन डे मनाया जाता है।

Valentine Week List 2022: Day Wise Detail

1. 7th February 2022- Rose Day 

वेलेंटाइन डे वीक की शुरुआत रोज डे से होती है और प्रेमी जोड़ा एक दूसरे को लाल गुलाब का फूल भेंट करते है जो कि उनकी एक दूसरे के प्रति प्यार भावना का प्रतीक माना जाता हैं। पीला गुलाब का फूल का अर्थ यह माना जाता हैं कि वो सच्ची और विश्वास की भावना को प्रदर्शित करता है। सफेद गुलाब का फूल यह प्रदर्शित करता है कि आपने जिसे इसे दिया है, आप उसे शादी करने का प्रपोजल दे रहे है।

2. 8th February 2022- Propose Day 

Valentine's day का दूसरा दिन प्रपोज डे के रूप मैं मनाया जाता है। इस दिन आप अपनी प्रेमिका/प्रेमी को कोई अच्छा सा प्रपोज डे कार्ड या अंगूठी या उसकी पसंद का कोई और प्यारा सा गिफ्ट दे सकते है। उसे उसकी पसंद के किसी रेस्टोरेंट, कॉफी शॉप या पार्क में ले जाकर अपनी उसके प्रति प्यार भावना का इजहार या प्रपोज कर सकते है और उसे भी आपके प्रति अपनी प्रेम भावनाओ को इजहार करने को कह सकते है।

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3. 9th February 2022- Choclate Day

Valentine's day का तीसरा दिन चॉकलेट डे के रूप मैं मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि मीठा या मिठाई नए रिश्ते की शुरुआत मैं एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। भारतीय संस्कृति में भी अगर शादी के लिए कोई लड़का या लड़की देखने जाते है और सब कुछ सही रहने पर मुंह मीठा करवाने की परंपरा है। इस दिन आप अपने प्रेमी/प्रेमिका को चॉकलेट का एक बॉक्स गिफ्ट कर सकते है और उसे यह विश्वास दिला सकते है कि हमारा रिश्ता भी इस जैसे मीठे की तरह हमेशा मिठास पूर्ण रहेगा।

4. 10th February 2022- Teddy Day 

Valentine's day का चौथा दिन टैडी डे के रूप में मनाया जाता हैं। बचपन हो या कोई भी उम्र, नरम खिलोने हर किसी को अच्छे लगते है और अक्सर आपने छोटे बच्चो या बड़ों को भी इन्हे प्यार से अपने गले लगाते देखा और बच्चो को तो इन्हे जोर से अपनी बांहों में भींचते और इनके साथ ही सोते देखा होगा। टेडी डे के दिन आप अपनी प्रेमिका/प्रेमी को टैडी बीयर , पांडा या उसकी मनपसंद की कोई गुड़िया या खिलौना गिफ्ट दे सकते है।

5. 11th February 2022- Promise Day

Valentine's day का पांचवा दिन प्रोमिस डे के रूप मैं मनाया जाता है। इस दिन एक दूसरे को ये प्रोमिस किया जाता है कि जीवन के हर मोड़ पर चाहे वो खुशी का समय हो या दुख का समय, साथ- साथ  ही रहेंगे।

6. 12th February 2022- Hug Day

Valentine's day छठा दिन हग डे के रूप में मनाया जाता हैं। हमने अक्सर देखा होगा कि दो आपस में प्यार करने वाले जब मिलते है तो एक दूसरे को जोर से अपनी बांहों में कस लेते है या हग कर लेते है। इस दिन प्रेमी/प्रेमिका एक दूसरे को अपनी बांहों में कस कर अपने प्यार का इजहार कर के हग डे मनाते है।

7. 13th February 2022- Kiss Day  

Valentine's day का सातवां दिन किस डे के रूप में मनाया जाता हैं। इस दिन प्रेमी/प्रेमिका एक दूसरे को किस करके अपने प्यार का इजहार करते हैं और आप एक दूसरे को इस स्पेशल दिन का एहसास करवाने के लिए कोई स्पेशल गिफ्ट दे सकते है।

               Valentine day 

14 फरवरी यानी प्रेमी जोड़ों का सबसे पसंदीदा दिन जिसका हर प्रेमी जोड़ा बड़ी बेसब्री से इंतजार करता है। इस दिन आप अपनी प्रेमिका को उसके किसी मनपसंद होटल या रेस्टोरेंट में लंच या डिनर पर ले जा सकते है या उसकी पसंद का कोई गिफ्ट दे सकते हैं। अगर आप शादी शुदा है तो कोई भी उसकी पसंद का खाना बना कर उसे खुशी का एहसास करवा सकता है। इस दिन प्रेमी/प्रेमिका को एक दूसरे के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताना चाहिए और एक दूसरे का इस रिश्ते को दिए गए वक्त और योगदान के लिए धन्यवाद करना चाहिए।



Budhwar Vrat Vidhi

बुध ग्रह की शांति और समस्त सुखों की इच्छा रखने वाले सभी स्त्री पुरुषों को बुधवार का व्रत करना चाहिए। सफेद फूल, सफेद वस्त्र और सफेद चंदन से बुध देव जी महाराज की पूजा करनी चाहिए। बुधवार के व्रत के दिन दिन में एक बार ही भोजन करना चाहिए।
बुधवार के व्रत के दिन हरी खाद्य वस्तुओं जैसे हरी सब्जियां, मूंग की दाल, पालक, हरे अंगूर आदि का सेवन करना अच्छा माना जाता है। बुधवार की कथा और आरती के बाद स्वयं और परिवार में प्रसाद का वितरण करें।
Budhwar Vrat Vidhi

     बुधवार व्रत कथा

एक व्यक्ति अपनी पत्नी को विदा करवाने अपनी ससुराल गया। कुछ दिन रहने के बाद उसने अपने सास- ससुर से अपनी पत्नी को विदा करने के लिए कहा। उसके सास- ससुर तथा अन्य संबंधियों ने कहा कि आज बुधवार का दिन हैं, आज के दिन गमन नहीं करते। वह व्यक्ति नहीं माना और हठधर्मी से बुधवार के दिन ही अपनी पत्नी को विदा करवाकर अपने नगर को चल दिया।
रास्ते में उसकी पत्नी को बहुत जोर से प्यास लगी तो उसने अपने पति से कहा कि मुझे बहुत जोर से प्यास लगी है। वह व्यक्ति हाथ मैं लोटा लेकर गाड़ी से उतरकर जल लेने चला गया।
जब वह जल लेकर वापिस आया तो यह देखकर आश्चर्य चकित रह गया कि बिल्कुल उसकी जैसी शक्ल सूरत का एक व्यक्ति और बिल्कुल उसी के जैसी वेशभूषा पहने एक व्यक्ति गाड़ी मैं उसकी पत्नी के बगल में बैठा हुआ हैं।
यह देखकर वह व्यक्ति बहुत क्रोधित हुआ और उस व्यक्ति से बोला "तुम कौन हो जो मेरी पत्नी के निकट बैठे हो?" इस पर उस की पत्नी के पास बैठा व्यक्ति बोला " यह मेरी पत्नी है और मैं अभी- अभी इसे ससुराल से विदा करवाकर ला रहा हूं ।"
वो दोनो व्यक्ति आपस में झगड़ने लगे। तभी राज्य के सिपाही आए और उन्होंने उस लोटा लेकर पानी लेने गए असली व्यक्ति को ही पकड़ लिया तथा उस स्त्री से पूछा "तुम्हारा असली पति कौन सा है ?"
उसकी पत्नी शांत ही रही क्योंकि वह पहचान ही नही पा रही थी कि उसका असली पति कौन सा हैं, क्योंकि देखने में दोनो व्यक्ति बिल्कुल एक जैसे ही थे और उनकी वेशभूषा भी बिल्कुल एक जैसी थी।
असली वाला व्यक्ति मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने लगा कि "हे भगवन ! यह क्या लीला है कि सच्चा झूठा बन रहा है।" तभी आकाशवाणी हुई कि हे मूर्ख आज बुधवार के दिन तुझे गमन नहीं करना था । तुम्हें सभी ने बहुत समझाया परंतु तुमने किसी की बात नही मानी। यह सब लीला बुधदेव भगवान की ही हैं।
उस व्यक्ति ने बुधदेव जी महाराज से प्रार्थना की और अपनी गलती के लिए क्षमा की याचना की। तब मनुष्य के रूप में आए भगवान बुधदेव जी अंतर्ध्यान हो गए। वह व्यक्ति बुधदेव की कथा कहते हुए अपनी पत्नी के साथ सकुशल घर लौट आया। इस के बाद दोनो पति पत्नी नियमपूर्वक बुधवार का व्रत और उद्यापन करने लगे और सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगे।
जो व्यक्ति इस कथा को सुनता है या दूसरो को सुनाता है, उसको बुधवार के दिन यात्रा करने का कोई दोष नही लगता है और सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है।
Budhwar Vrat Vidhi


   बुधवार की आरती 

आरती युगलकिशोर की कीजे। 
तन मन न्योछावर कीजे।।  टेक।।
गोरश्याम मूक निरखत लीजै ।
हरि का स्वरूप नयन भरि पीजै।।
रवि शशि कोटि बदन की शोभा ।
ताहि निरखि मेरे मन लोभा ।।
ओढ़े नील पीत पट सारी।
कुंज बिहारी गिरिवर धारी।।
फूलन की सेज फूलन की माला।
रत्न सिंहासन बैठे नंदलाला।।
मोरमुकुट कर मुरली सोहै ।
नटवर कला देखि मन मोहै ।।
कंचन थार कपूर की बाती।
हरि आए निर्मल भई छाती ।।
श्री पुरोषतम गिरिवर धारी।
आरती करत सकल ब्रज नारी ।।
नंदनंदन बृजभानु किशोरी।
परमानंद स्वामी अविचल जोरी।।




Basant Panchmi 2022: Katha Pooja Vidhi

बसन्त पंचमी हर वर्ष हिंदू कैलेंडर के अनुसार माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को पूरे भारतवर्ष में बहुत ही श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता हैं। इस दिन ज्ञान और विद्या की देवी माता सरस्वती की पूजा - अर्चना की जाती है।

Basant Panchmi 2022: Katha Pooja Vidhi

बसंत मास भारत की छह ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। भारत में बसंत ऋतु का समय फरवरी से मार्च महीने तक माना जाता है। बसंत ऋतु के दौरान मौसम अत्यंत सुहावना और मनमोहक बन जाता है। मौसम मैं न तो ज्यादा ठंड रहती है और न ही ज्यादा गर्मी। पेड़ पौधों पर नये पते आने लगते है और कोयल पक्षी की मधुर ध्वनि सुनाई देने लगती है। खेतो में दूर दूर तक सरसो की फसल लहलहाती दिखाई पड़ती है और सरसो के दूर तक फैले पीले फूल बहुत ही मनभावन दृश्य उत्पन्न करते है। बसंत पंचमी को भारत में बसंत पंचमी,सरस्वती पूजा, रति काम महोत्सव,बसंत महोत्सव और बाघीश्वरी जयंती के नाम से भी जाना और मनाया जाता है।

बसंत पंचमी 2022 का समय और शुभ मुहूर्त 

बसंत पंचमी फरवरी 2022 को 5 तारीख शनिवार को मनाई जाएगी। बसंत पंचमी का शुभ मुहूर्त  5 फरवरी को सुबह 3:48 से लेकर 6 फरवरी सुबह 03:46 बजे तक रहेगा।

        बसंत पंचमी व्रत कथा 

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी धरती पर विचरण करने निकले और उन्होंने मनुष्यो और जीव जंतुओं को देखा तो सभी नीरस और शांत दिखाई दिए । यह देखकर ब्रह्मा जी को अपनी बनाई सृष्टि में कुछ कमी लगी और उन्होंने अपने कमंडल से थोड़ा सा जल निकलकर पृथ्वी पर छिड़क दिया । ब्रह्मा जी द्वारा जल छिड़कते ही चार भुजाओं वाली एक सुंदर स्त्री प्रकट हुई जिनके एक हाथ में वीणा, एक हाथ में माला,एक में पुस्तक और एक हाथ वरदान मुद्रा थी। ब्रह्मा जी ने उन्हे ज्ञान की देवी सरस्वती के नाम से पुकारा। ब्रह्मा जी की आज्ञा अनुसार देवी माता सरस्वती ने अपनी वीणा के तार झंकृत किये जिससे धरती के सभी प्राणी बोलने लगे,नदिया कल कल की मधुर ध्वनि से बहने लगी और हवा ने भी सन्नाटे को चीरते हुए संगीत पैदा किया। तभी से बुद्धि व संगीत की देवी माता सरस्वती की पूजा की जाने लगी।
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार देवी सरस्वती ने भगवान श्रीकृष्ण को देख लिया था और वह उन पर मोहित हो गई थी। वह भगवान श्री कृष्ण को पति के रूप में पाना चाहती थी, लेकिन जब भगवान श्री कृष्ण को इस बात का पता चला तो उन्होने कहा कि वह केवल राधारानी के प्रति समर्पित हैं।लेकिन सरस्वती को मनाने के लिये उन्होनें वरदान दिया कि आज से माघ मास की पंचमी तिथि को समस्त विश्व तुम्हारी विद्या व ज्ञान की देवी के रूप में पूजा करेगा। उसी समय सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण ने सर्वप्रथम देवी सरस्वती की पूजा की और तब से लगातार बसंत पंचमी के दिन सभी माता सरस्वती की ज्ञान और विद्या की देवी के रूप मैं पूजा करते आ रहे हैं।
माता सरस्वती को बागीश्वरी,भगवती,शारदा,वीनावादिनी और वाग्देवी आदि नामो से भी जाना जाता हैं ।

 बसंत पंचमी पर माता सरस्वती की पूजा विधि 

बसंत पंचमी के दिन माता सरस्वती की पूजा करने के लिये सबसे पहले जहां पूजा करनी हो, उस जगह को अच्छी तरह से साफ कर ले और माता सरस्वती की प्रतिमा रखें। कलश स्थापित कर सर्वप्रथम भगवान गणेश जी का नाम लेकर पूजा शुरू करें। सर्वप्रथम माता सरस्वती को स्नान कराएं। उसके बाद माता सरस्वती को सफेद वस्त्र और माला पहनाएं और पीले रंग  के फूल अर्पित करें और माता का श्रृंगार करें। सरस्वती माता को पीले या मौसमी फल और बूंदी चढ़ाए और खीर का भोग लगाएं। माता सरस्वती विद्या और वाणी की देवी है इसलिए पूजा के समय पुस्तके या फिर वाद्ययंत्रों का भी पूजन करें।

   बसंत पंचमी पर क्या खाएं?

बसंत पंचमी पर पीले या केसरी मीठे चावल सबसे ज्यादा प्रचलित है। केसरी चावल बनाते समय उसमे थोड़ा सा खाने वाला केसरी रंग या केसर और पीले चावल बनाते समय उसमें थोड़ा सा खाने वाला पीला रंग डाल दे। यथा शक्ति काजू, बादाम,किशमिश और छोटी इलायची के दानों का भी उपयोग इसमें कर सकते हैं।

        बसंत पंचमी के वस्त्र 

बसंत पंचमी को पुरुष पीले रंग की शर्ट या स्वेटर डाल सकते है और महिलाएं पीले रंग का सलवार कमीज या पीली साड़ी को धारण करना श्रेष्ठ माना गया हैं।

       पीले रंग का महत्व

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार रंगो का हमारे जीवन से गहरा नाता है और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पीला रंग देवगुरु बृहस्पति का प्रिय रंग माना जाता हैं। पीला रंग हमारे दिमाग को अधिक सक्रिय करता हैं और जीवन में उमंग बढ़ाने में सहायक है। पीला रंग अधिक पहनने से आत्मविश्वास मैं वृद्धि होती हैं और देवगुरु बृहस्पति का शुभ फल प्राप्त होता हैं। 

       बसंत पंचमी और शुभ कार्य

बसंत पंचमी को अत्यंत शुभ मुहूर्त माना जाता है और इस दिन सगाई या शादी ब्याह की अधिकता रहती हैं। देश के अनेक क्षेत्रों खासकर गुजरात मैं इस दिन जबरदस्त पतंगबाजी का आयोजन किया जाता है और पतंगबाजी मुकाबलों का भी आयोजन किया जाता हैं। जो लोग अपने छोटे दूध पीने वाले बच्चो का अन्नप्राशन संस्कार करवाना चाहते है, वो बच्चे की आयु अगर अब अन्न ग्रहण करने लायक हो गई हो तो बच्चे को नहला कर नये कपड़े डाल कर घर के बड़े बुजुर्ग बच्चे को अपनी गोद मैं बिठाएं। माता सरस्वती का नाम लेते हुए चांदी की कटोरी या चांदी के चम्मच से बच्चे को चावल की थोड़ी सी खीर खिला कर अन्नप्राशन संस्कार कर सकते हैं।

      बसंत पंचमी को क्या न करें 

बसंत पंचमी को स्नान करने के बाद माता सरस्वती का पूजन करने के बाद ही ही कुछ ग्रहण करे। बसंत पंचमी के दिन मांस मदिरा से दूरी बना कर रखे और सात्विक भोजन ग्रहण करें। किसी को अपनी वाणी से अपशब्द या बुराई न करें। इस दिन से बसंत ऋतु का शुभ आगमन भी हो जाता है, अत: इस दिन पेड़ पौधों को कटाई छटाई भी इस दिन नही करनी चाहिये।


Mangalvar Vrat Katha Aarti: हनुमान जी करेगे बेड़ा पार

    मंगलवार व्रत की विधि

सर्वसुख, राजसम्मान तथा पुत्र प्राप्ति के लिए मंगलवार का व्रत करना शुभ है। इसे 21 सप्ताह लगातार करना चाहिए। लाल पुष्प, लाल चंदन, लाल फल अथवा लाल मिठाई से हनुमान जी का पूजन करें। लाल वस्त्र धारण करें। कथा पढ़ने -सुनने के बाद, हनुमान चालीसा, हनुमानाष्टक तथा बजरंग बाण का पाठ करने से शीघ्र फल प्राप्त होता है।

Mangalvar Vrat Katha Aarti

     मंगलवार व्रत की कथा

एक ब्राह्मण दंपति के कोई संतान न थी, जिस कारण पति-पत्नी दोनों दुखी रहते थे। एक समय वह ब्राह्मण हनुमान जी की पूजा हेतु वन में चला गया। वहां वह पूजा के साथ महावीर जी से एक पुत्र की कामना किया करता। घर में उसकी पत्नी भी पुत्र प्राप्ति के लिए मंगलवार को व्रत किया करती थी। मंगल के दिन व्रत के अंत में भोजन बनाकर हनुमान जी को भोग लगाने के बाद स्वयं भोजन ग्रहण करती थी।
 एक बार कोई व्रत आ गया जिसके कारण ब्राह्मणी भोजन न बना सकी और हनुमान जी का भोग भी नहीं लगा। वह अपने मन में ऐसा प्रण करके सो गई कि अब अगले मंगलवार को हनुमान जी को भोग लगाकर ही भोजन करूंगी। वह भूखी-प्यासी छह दिन बिना कुछ खाये- पिये पड़ी रही। मंगलवार के दिन उसे मूर्छा आ गई । हनुमान जी उसकी लगन और निष्ठा को देखकर प्रसन्न हो गए । उन्होंने उसे दर्शन दिये और कहा- "मैं तुम से अति प्रसन्न हूं । मैं तुम्हें एक सुंदर बालक देता हूं, जो तुम्हारी बहुत सेवा किया करेगा।" हनुमान जी मंगल को बाल रूप में उसको दर्शन देकर अंतर्ध्यान हो गए।

सुंदर बालक पाकर ब्राह्मणी अति प्रसन्न हुई। ब्राह्मणी ने बालक का नाम मंगल रखा। कुछ समय पश्चात ब्राह्मण वन से लौटकर आया तो एक प्रसन्न चित्त सुंदर बालक को घर में खेलता देखकर, ब्राह्मण ने अपनी पत्नी से पूछा-  "यह बालक कौन है?" पत्नी ने कहा- "मंगलवार के व्रत से प्रसन्न हो हनुमान जी ने दर्शन देकर मुझे यह बालक दिया है ।" ब्राह्मण को पत्नी की बात पर विश्वास नहीं हुआ। उसने सोचा कि यह कुलटा, व्यभिचारिणी अपनी कलुष्टा छिपाने के लिए बात बना रही है।
एक दिन ब्राह्मण कुएं पर पानी भरने जाने लगा तो ब्राह्मणी ने कहा कि मंगल को भी अपने साथ ले जाओ। ब्राह्मण मंगल को भी साथ ले गया परंतु वह उस बालक को नाजायज मानता था इसलिए उसे कुएं में डालकर पानी भर घर वापस आ गया। ब्राह्मणी ने ब्राह्मण से पूछा कि मंगल कहां है? तभी मंगल मुस्कुराता हुआ घर वापस आ गया। उसे वापस आया देखकर ब्राह्मण आश्चर्यचकित रह गया। रात्रि में उस ब्राह्मण को हनुमान जी ने स्वपन में कहा- "यह बालक मैंने दिया है, तुम पत्नी को कुल्टा क्यों कहते हो?"
ब्राह्मण यह सत्य जानकर अत्यंत हर्षित हुआ। उसके बाद वह  ब्राह्मण दंपति मंगल को व्रत रख अपना जीवन आनंदपूर्वक व्यतीत करने लगे। जो मनुष्य मंगलवार व्रत कथा को पढ़ता है या सुनता है और नियम से व्रत रखता है, हनुमान जी की कृपा से उसके सब कुछ दूर होकर सर्व सुख प्राप्त होते हैं।

    मंगलवार तथा मंगलिया की कथा

एक बुढ़िया थी। वह मंगल देवता को अपना इष्ट देवता देवता मानकर सदैव मंगल का व्रत रखती और मंगल देव का पूजन किया करती थी। उसका एक पुत्र था जो मंगलवार को उत्पन्न हुआ था। इस कारण वह उसको मंगलिया के नाम से पुकारा करती थी। मंगलवार के दिन न तो घर लीपती और ना ही पृथ्वी खोदा करती। एक दिन मंगल देवता उसकी श्रद्धा की परीक्षा लेने के लिए साधु का रूप धारण करके आए और उसके द्वार पर आकर आवाज दी। बुढ़िया घर से बाहर आई और साधु को खड़ा देखकर हाथ जोड़कर बोली- "महाराज क्या आज्ञा है?" साधु ने कहा मुझे बहुत भूख लगी है भोजन बनाना है उसके लिए थोड़ी सी पृथ्वी लीप दे तो तेरा पुण्य होगा। यह सुन बुढ़िया ने कहा-"महाराज आज में मंगलवार की व्रती हूं, इसलिए मैं चौका नहीं लगा सकती। आप कहें तो जल का छिड़काव कर दूं। वहां पर आप भोजन बना लीजिए।" साधु ने कहा- "मैं गोबर से लीपे (चौक) पर खाना बनाता हूं।" बुढ़िया ने कहा-"पृथ्वी लीपने के अलावा और कोई सेवा हो तो मैं वह करने के लिए उपस्थित हूं।" साधु ने कहा- "सोच समझकर उत्तर दो। बुढ़िया कहने लगी-महाराज, पृथ्वी लीपने के अलावा जो भी आप आज्ञा करेंगे, उसका मैं अवश्य पालन करूंगी।" बुढ़िया ने ऐसा वचन तीन बार दिया। तब साधु ने कहा- "तू अपने लड़के को बुलाकर औंधा लिटा दे, मैं उसकी पीठ पर भोजन बनाऊंगा।" साधु की बात सुनकर बुढ़िया चुप रह गई। तब साधु ने कहा-" बुला लड़के को, अब सोच-विचार क्या करती हैं?" बुढ़िया मंगलिया, मंगलिया कह कर अपने पुत्र को पुकारने लगी। थोड़ी देर बाद उसका लड़का आ गया। बुढ़िया ने कहा- "जा बेटे तुझको बाबाजी बुलाते हैं।" लड़के ने बाबाजी से जाकर पूछा- क्या आज्ञा है  महाराज?" बाबाजी  ने कहा जाओ अपनी माताजी को बुला लाओ। जब माताजी आ गई तो साधु ने कहा कि तू ही इसको लिटा दे। बुढ़िया ने मंगल देवता का स्मरण करते हुए लड़के को औंधा लिटा दिया और उसकी पीठ पर अंगीठी रख दी। उसने साधु से कहा-"महाराज अब आपको जो कुछ करना है कीजिए, मैं जाकर अपना काम करती हूं ।" साधु ने लड़के की पीठ पर रखी हुई अंगीठी में आग जलाई और उस पर भोजन बनाया। जब भोजन बन चुका तो साधु ने बुढ़िया से कहा कि अपने लड़के को बुलाओ "वह भी आकर भोग ले जाए।" बुढ़िया कहने लगी कि "यह कितने आश्चर्य की बात है महाराज कि आपने उसकी पीठ पर आग जलाई और उसी को प्रसाद के लिये बुलाते हो? आप कृपा कर उसका स्मरण भी मुझको ना कराए और भोग लगाकर जहां जाना हो जाइए।" साधु द्वारा आग्रह करने पर बुढ़िया ने ज्यों ही मंगलिया कहकर अपने पुत्र को आवाज लगाई त्यों ही वह एक और से दौड़ता हुआ आ गया। साधु ने लड़के को प्रसाद दिया और कहा- माई तेरा व्रत सफल हो गया। तेरे ह्रदय में दया है और अपने इष्टदेव में अटल श्रद्धा हैं। इसके कारण तुझको कभी कोई कष्ट नहीं पहुंचेगा।

Mangalvar Vrat Katha Aarti

    हनुमान जी की आरती

आरती कीजै हनुमान लला की।
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।
जाके बल से गिरिवर कांपे।
रोग-दोष जाके निकट न झांके।।
अंजनी पुत्र महाबल दाई।
संतन के प्रभु सदा सहाई।।
दे बीरा रघुनाथ पठाये।
लंका जारि सिया सुधि लाये।।
लंका सो कोट समुद्र सी खाई।
जात पवनसुत वार न लाई।।
लंका जारि असुर संहारे।
सियाराम जी के काज सवारे।।
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे।
आनि संजीवन प्राण उबारे।।
पैठि पाताल तोरि जम कारे।
अहिरावण की भुजा उखारे।।
बायें भुजा असुर दल मारे।
दाहिने भुजा संतजन तारे।।
सुर नर मुनि जन आरती उतारे।
जय जय जय हनुमान उचारे।।
कंचन थार कपूर लौ छाई।
आरती करती अंजना माई।।
जो हनुमान जी की आरती गावे।
बसि बैकुंठ परमपद पावे।
लंका विध्वंस कीन्ह रघुराई।
तुलसीदास प्रभु आरती गाई।।