रविवार, अप्रैल 19, 2026
श्री गणेश जी की आरती | जय गणेश जय गणेश देवा
गुरुवार, अप्रैल 16, 2026
मंगलवार व्रत कथा और आरती – हनुमान जी का मंगलकारी व्रत
सर्व सुख, राज सम्मान, तथा पुत्र प्राप्ति के लिए मंगलवार का व्रत करना शुभ है। इसे 21 सप्ताह लगातार करना चाहिए। लाल पुष्प, लाल चंदन, लाल फल अथवा लाल मिठाई से हनुमान जी का पूजन करें।
लाल वस्त्र धारण करें। मंगलवार व्रत कथा पढ़ने सुनने के बाद, हनुमान चालीसा, हनुमानाष्टक तथा बजरंग बाण का पाठ करने से शीघ्र फल प्राप्त होता है।
मंगलवार व्रत कथा
एक ब्राह्मण दंपति के कोई संतान न थी, जिस कारण पति पत्नी दोनो दुखी रहते थे। एक समय वह ब्राह्मण हनुमान जी की पूजा हेतु वन में चला गया। वहां वह पूजा के साथ महावीर जी से एक पुत्र की कामना किया करता था।
घर में उसकी पत्नी भी पुत्र प्राप्ति के लिए मंगलवार को व्रत किया करती थी। मंगल के दिन व्रत के अंत में भोजन बनाकर हनुमान जी को भोग लगाने के बाद स्वयं भोजन ग्रहण करती थी।
एक बार कोई व्रत आ गया जिसके कारण ब्राह्मणी भोजन न बना सकी और हनुमान जी का भोग भी नहीं लगा। वह अपने मन में ऐसा प्रण करके सो गई कि अब अगले मंगलवार को हनुमान जी को भोग लगाकर ही भोजन करूंगी।
वह भूखी प्यासी छह दिन तक बिना कुछ खाए पिए पड़ी रही। मंगलवार के दिन उस मूर्छा आ गई। हनुमान जी उसकी लगन और निष्ठा को देखकर प्रसन्न हो गए। उन्होंने उसे दर्शन दिए और कहा- "मैं तुम से अति प्रसन्न हूं।
"मैं तुम्हें एक सुंदर बालक देता हूं, जो तुम्हारी बहुत सेवा किया करेगा" हनुमान जी मंगल को बाल रूप में उसको दर्शन देकर अंतर्ध्यान हो गए।
सुंदर बालक पाकर ब्राह्मणी अति प्रसन्न हुई। ब्राह्मणी ने बालक का नाम मंगल रखा। कुछ समय पश्चात ब्राह्मण वन से लौटकर आया तो एक प्रसन्न चित्त सुंदर बालक को घर में खेलता देखकर, ब्राह्मण ने अपनी पत्नी से पूछा- "यह बालक कौन है?"
पत्नी ने कहा- "मंगलवार के व्रत से प्रसन्न हो हनुमान जी ने दर्शन देकर मुझे यह बालक दिया है।" ब्राह्मण को पत्नी की बात पर विश्वास नहीं हुआ। उसने सोचा कि यह कुलटा, व्याभिचारिणी अपनी कलुष्टा छिपाने के लिए बात बना रही है।
एक दिन ब्राह्मण कुएं पर पानी भरने जाने लगा तो ब्राह्मणी ने कहा कि मंगल को भी अपने साथ ले जाओ। ब्राह्मण मंगल को भी साथ ले गया परंतु वह उस बालक को नाजायज मानता था इसलिए उसे कुएं में डालकर पानी भर घर वापस आ गया।
ब्राह्मणी ने ब्राह्मण से पूछा कि मंगल कहां है? तभी मंगल मुस्कुराता हुआ घर वापिस आ गया। उसे वापस आया देखकर ब्राह्मण आश्चर्यचकित रह गया। रात्रि में उस ब्राह्मण को हनुमान जी ने स्वपन में कहा- "यह बालक मैंने दिया है, तुम पत्नी को कुल्टा क्यों कहते हो?"
ब्राह्मण यह सत्य जानकर अत्यंत हर्षित हुआ। उसके बाद वह ब्राह्मण दंपति मंगल का व्रत रख अपना जीवन आनंदपूर्वक व्यतीत करने लगे।
जो मनुष्य श्रद्धा पूर्वक मंगलवार व्रत कथा को पढ़ता है या सुनता है और नियम से व्रत रखता है, हनुमान जी की कृपा से उसके सब कुछ दूर होकर सर्व सुख प्राप्त होते हैं।
मंगलवार और मंगलिया की कहानी
एक बुढ़िया थी। वह मंगल देवता को अपना इष्ट देवता मानकर सदैव मंगलवार का व्रत रखती और मंगल देव का पूजन किया करती थी। उसका एक पुत्र था जो मंगलवार को उत्पन्न हुआ था।
इस कारण वह उसको मंगलिया के नाम से पुकारा करती थी। बुढ़िया मंगलवार के दिन न तो घर को गोबर से लिपती और ना ही पृथ्वी खोदा करती।
एक दिन मंगल देवता उसकी श्रद्धा की परीक्षा लेने के लिए साधु का रूप धारण करके आए और उसके द्वार पर आकर आवाज दी। बुढ़िया घर से बाहर आई और साधु को खड़ा देखकर हाथ जोड़कर बोली- "महाराज क्या आज्ञा है?"
साधु ने कहा मुझे बहुत भूख लगी है भोजन बनाना है उसके लिए थोड़ी सी पृथ्वी लीप दे तो तेरा पुण्य होगा। यह सुन बुढ़िया ने कहा-"महाराज आज में मंगलवार की व्रती हूं, इसलिए मैं चौका नहीं लगा सकती। आप कहें तो जल का छिड़काव कर दूं। वहां पर आप भोजन बना लीजिए।"
साधु ने कहा- "मैं गोबर से लीपे (चौक) पर खाना बनाता हूं।" बुढ़िया ने कहा-"पृथ्वी लीपने के अलावा और कोई सेवा हो तो मैं वह करने के लिए उपस्थित हूं।"
साधु ने कहा- "सोच समझकर उत्तर दो। बुढ़िया कहने लगी-महाराज, पृथ्वी लीपने के अलावा जो भी आप आज्ञा करेंगे, उसका मैं अवश्य पालन करूंगी।" बुढ़िया ने ऐसा वचन तीन बार दिया।
तब साधु ने कहा- "तू अपने लड़के को बुलाकर पेट के बल लिटा दे, मैं उसकी पीठ पर भोजन बनाऊंगा।" साधु की बात सुनकर बुढ़िया चुप रह गई। तब साधु ने कहा-" बुला लड़के को, अब सोच-विचार क्या करती हैं?"
बुढ़िया मंगलिया, मंगलिया कह कर अपने पुत्र को पुकारने लगी। थोड़ी देर बाद उसका लड़का आ गया। बुढ़िया ने कहा- "जा बेटे तुझको बाबाजी बुलाते हैं।"
लड़के ने बाबाजी से जाकर पूछा- क्या आज्ञा है महाराज?" बाबाजी ने कहा जाओ अपनी माताजी को बुला लाओ।
जब माताजी आ गई तो साधु ने कहा कि तू ही इसको लिटा दे। बुढ़िया ने मंगल देवता का स्मरण करते हुए लड़के को औंधा लिटा दिया और उसकी पीठ पर अंगीठी रख दी
उसने साधु से कहा-"महाराज अब आपको जो कुछ करना है वो कीजिए, मैं जाकर अपना काम करती हूं।" साधु ने लड़के की पीठ पर रखी हुई अंगीठी में आग जलाई और उस पर भोजन बनाया।
जब भोजन बन चुका तो साधु ने बुढ़िया से कहा कि अपने लड़के को बुलाओ "वह भी आकर भोग ले जाए।" बुढ़िया कहने लगी कि "यह कितने आश्चर्य की बात है महाराज कि आपने उसकी पीठ पर आग जलाई और उसी को प्रसाद के लिए बुलाते हो?
आप कृपा कर उसका स्मरण भी मुझको ना कराए और भोग लगाकर जहां जाना हो जाइए।" साधु द्वारा आग्रह करने पर बुढ़िया ने ज्यों ही मंगलिया कहकर अपने पुत्र को आवाज लगाई त्यों ही वह एक और से दौड़ता हुआ आ गया।
साधु ने लड़के को प्रसाद दिया और कहा- माई तेरा व्रत सफल हो गया। तेरे ह्रदय में दया है और अपने इष्टदेव में अटल श्रद्धा हैं। इसके कारण तुझको कभी कोई कष्ट नहीं पहुंचेगा।
हनुमान जी की आरती
रविवार, अप्रैल 05, 2026
गुरुवार व्रत कथा: बृहस्पति देव की पूजा विधि, नियम व महत्व
गुरुवार को बृहस्पति देव की व्रत कथा और पूजा का विधान है। बृहस्पति देव को देवताओं का गुरू माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बृहस्पति देव को धन, वैभव, मान, सम्मान, समृद्धि, विवाह, संतान और जीवन के प्रत्येक सुख समृद्धि का कारक माना जाता है।
गुरुवार व्रत कथा (Guruvar Vrat Katha)
एक नगर में एक बड़ा व्यापारी रहा करता था। वह जहाज में माल लदवा कर दूसरे देशों को भेजा करता था और ख़ुद भी जहाजों के साथ दूर दूर के देशों को जाया करता था। इस तरह वह खूब धन कमाकर लाता था।
उसकी गृहस्थी बड़े मजे से चल रही रही थी। वह दान पुण्य भी खूब दिल खोलकर करता था और गुरूवार के दिन बृहस्पति देव का व्रत रखता और कथा पढ़ता और चना और मुनक्का का प्रसाद बांटा करता था।
परंतु उसका इस तरह से दान देना उसकी पत्नी को बिल्कुल भी पसंद न था। उसकी पत्नी तो किसी को एक दमड़ी देकर भी खुश न थी।
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एक बार जब वह सौदागर माल से जहाज को भरकर किसी दूसरे देश को गया हुआ था तो पीछे से बृहस्पति देवता साधु का रूप धारण कर उसकी कंजूस पत्नी के पास पहुंचे और भिक्षा की याचना की।
उस व्यापारी की पत्नी ने बृहस्पति देवता से कहा महात्मा जी! "में तो दान पुण्य से बहुत तंग आ गई। मेरा पति सारा धन दान पुण्य में व्यर्थ ही नष्ट करता हैं। आप कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे हमारा सारा धन नष्ट हो जाए। इससे न तो धन लूटेगा और न ही मुझे दुख होगा"।
बृहस्पति देवता ने कहा देवी ! तुम बड़ी विचित्र हो। धन और संतान तो सभी चाहते है। पुत्र और लक्ष्मी तो पापी के घर में भी होनी चाहिए। यदि तुम्हारे पास बहुत धन है तो तुम दिल खोलकर दान पुण्य के कार्य करो।
भूखों को भोजन खिलाओ, प्यासों को पानी पिलाओ, यात्रियों के लिए धर्मशालाएं बनवाओ,कितनी ही निर्धनों की विवाह योग्य कन्याए धन के अभाव में कुंवारी बैठी है, उनका विवाह संपन्न करवाओ।
इसके अतिरिक्त भी बहुत से अनेक पुण्य कार्य है, जिनको करके तुम्हारा लोक परलोक सार्थक हो सकता है।" लेकिन व्यापारी की स्त्री बड़ी ढीठ थी।
उसने कहा "महात्मा जी ! मैं इस विषय में आपकी कोई भी बात नही सुनना चाहती, मुझे ऐसे धन की कोई आवश्कता नही जो में दूसरो को बांटती रहूं"।
बृहस्पति देवता बोले यदि "यदि तुम्हारी ऐसी ही इच्छा हैं तो फिर ऐसा ही होगा। तुम सात बृहस्पतिवार गोबर से घर लीपकर पीली मिट्टी से अपने बालों को धोना, भोजन में मांस मदिरा ग्रहण करना, कपड़े धोना, बस तुम्हारा सारा धन नष्ट हो जायेगा"।
इतना कहकर बृहस्पति देवता अंतर्ध्यान हो गए। उस औरत ने बृहस्पति देवता के कहे अनुसार वैसा ही करने का निश्चय किया। केवल छः बृहस्पतिवार बीतने पर ही उस औरत का सारा धन नष्ट हो गया और वह स्वयं भी परलोक सिधार गई।
उधर माल से भरा उसके पति का जहाज समुंद्र में डूब गया और उसने बड़ी मुश्किल से लकड़ी के तख्तों पर बैठकर अपनी जान बचाई। वह रोता हुआ अपने नगर में वापिस पहुंचा। वहां आकर उसने देखा कि उसका सब कुछ नष्ट हो गया है।
उस व्यापारी ने अपनी पुत्री से सब समाचार पूछा। लड़की ने पिता को उस साधु (बृहस्पति देवता) वाली पूरी कहानी सुना दी। उसने पुत्री को शांत किया और अपने और अपने परिवार के भविष्य के बारे में सोचने लगा।
अब वह प्रति दिन सुबह जंगल में जाकर वहां से लकड़ियां चुन लाता और उन्हें नगर में बेचकर अपनी आजीविका चलाने लगा मगर उसका गुजर बसर बहुत ही मुश्किल से होता था।
एक दिन उसकी पुत्री ने दही खाने की इच्छा प्रकट की। लेकिन उस व्यापारी के पास एक भी पैसा नही था कि वह अपनी पुत्री को दही लाकर देता।
लकड़हारा अपनी पुत्री को आश्वासन देकर जंगल मैं जाकर एक वृक्ष के नीचे बैठकर अपनी पूर्व दशा को विचार कर रोने लगा।
वह गुरुवार का दिन था। बृहस्पति देवता उसकी यह अवस्था देखकर साधु का रूप धारण कर उस व्यापारी के पास आ पहुंचे और कहने लगे "हे लकड़हारे! तू जंगल में किस चिंता में बैठा है"।
व्यापारी ने उतर दिया "महाराज! आप सब कुछ जानने वाले है।" इतना कहकर उसने रुंधे गले और भीगी आंखों से बृहस्पति देवता को अपनी सारी आपबीती सुना दी।
बृहस्पति देवता ने कहा- "भाई, तुम्हारी पत्नी ने गुरुवार के दिन भगवान का अपमान किया था, इसी कारण तुम्हारा यह हाल हुआ हैं, लेकिन अब तुम किसी प्रकार की चिंता न करो।
भगवान तुम्हें पहले से भी अधिक धनवान करेंगे। तुम मेरे कहे अनुसार गुरुवार के दिन बृहस्पति देव का पाठ किया करो। दो पैसे के चने और मुनक्का मंगवाकर जल के लोटे में थोड़ी सी शक्कर डालकर अमृत बना लो।
फिर वह अमृत और प्रसाद परिवार के सब सदस्यों और कथा सुनने वालों में बांट दो, और खुद भी अमृत पान किया करो तथा प्रसाद खाया करो तो भगवान तुम्हारी सब मनोकामनाएं पूर्ण करेंगे।"
साधु को प्रसन्न देखकर उस व्यापारी ने कहा- "महाराज! मुझे लकड़ियों में से इतना भी लाभ नहीं कि दो पैसे की दही लाकर भी अपनी इकलौती कन्या को खिला पाऊं, उसको मैं हर रोज झूठा आश्वासन देकर टालता आता हूं।"
बृहस्पति देवता ने कहा-"भक्तराज, तुम चिंता मत करो आगामी गुरुवार के दिन तुम शहर में लकड़ियां बेचने के लिए जाना, तुमको उस दिन लकड़ियों के चार पैसे अधिक मिलेंगे।
जिस में से तुम दो पैसे का दही लाकर अपनी पुत्री को खिलाना और दो पैसे की मुनक्का और चने लाकर गुरुवार देवता की कथा करना।
जल में जरा सी शक्कर डालकर अमृत बनाना और कथा का प्रसाद सब मैं बांटना और खुद भी खाना तो तुम्हारे सारे कार्य सिद्ध हो जायेंगे। इतना कहकर बृहस्पति देवता अंतर्ध्यान हो गए।
गुरुवार के दिन उस व्यापारी ने जंगल में से लकड़ियां इकठ्ठी की और शहर में बेचने के लिए गया। उसको इस दिन चार पैसे अधिक मिले।
जिसमे से दो पैसे की दही लाकर उसने अपनी लड़की को दे दी और दो पैसे के चने और मुनक्का लेकर और अमृत बनाकर प्रसाद बांटा और प्रेम से खाया।
उसी दिन से उसकी सब कठिनाइयां दूर होने लगी। परंतु अगले गुरुवार को वह बृहस्पति देवता की कथा करना भूल गया।
शुक्रवार को उस नगर के राजा ने आज्ञा दी कि कल मैंने एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन करवाया है। इस लिए कोई भी व्यक्ति अपने घर में अग्नि न जलाएं और समस्त जनता मेरे यहां आकर भोजन करें। जो इस आदेश की अवहेलना करेगा, उसे सूली पर लटका दिया जायेगा।
राजा की आज्ञानुसार सभी लोग राजा के महल में भोजन करने गए लेकिन वह व्यापारी और उसकी लड़की तनिक विलंब से पहुंचे। और राजा ने उन दोनो को अपने महल के अंदर ले जाकर भोजन करवाया।
जब वह पिता पुत्री भोजन करके वापिस आ गए तो महारानी की दृष्टि उस खूंटी पर पड़ी जिस पर नौलखा हार टंगा हुआ था। उस खूंटी पर अब हार नहीं था।
महारानी को विश्वास हो गया कि उसका हार लकड़हारा और उसकी लड़की ही लेकर गए है। फौरन सैनिकों को बुलाकर दोनो बाप बेटी को कैद करवाकर जेल मैं डाल दिया गया।
कैदखाने में पड़कर बाप बेटी दोनों अत्यंत दुखी हुए। वहां उन्होंने बृहस्पति देवता का स्मरण किया। बृहस्पति देवता वही कैदखाने में प्रकट हो गए और व्यापारी से कहने लगे- "भक्तराज! तुम पिछले सप्ताह बृहस्पति देवता की कथा करना भूल गए थे, इसलिए तुम्हारा यह हाल हो गया है।
परंतु तुम किसी प्रकार की चिंता न करो। बृहस्पतिवार के दिन कैदखाने के दरवाजे पर तुम्हे दो पैसे पड़े दिखाई देंगे। तुम वह पैसे उठाकर किसी से चने और मुनक्का मंगवा लेना और विधि पूर्वक बृहस्पति देवता का पूजन करना, तुम्हारे सारे दुख दूर हो जाएंगे।
बृहस्पतिवार के दिन उस व्यापारी को जेल के मुख्य द्वार के पास दो पैसे पड़े हुए मिले। बाहर सड़क पर एक स्त्री जा रही थी। व्यापारी ने उसे बुलाकर विनती करते हुए कहा कि वह बाजार से उसे दो पैसे के चने मुनक्का ला दे ताकि मैं बृहस्पति देवता की कथा कर सकूं।
इस पर उस स्त्री ने कहा कि आज मेरे बेटे का विवाह है और मैं अपने बेटे-बहू के लिए कपड़े सिलवाने जा रही हूं। मैं बृहस्पति भगवान को क्या जानूं। इतना कहकर वह औरत चली गई।
थोड़ी देर बाद वहां से एक और स्त्री निकली। व्यापारी ने उसे बुलाकर प्रार्थना की — हे बहन! तुम मुझे बाजार से दो पैसे के चने और मुनक्का ला दो, मुझे बृहस्पतिवार की कथा करनी है।
वह स्त्री देवगुरु बृहस्पति का नाम सुनकर बोली — “बलिहारी जाऊं वीर भगवान के नाम पर, मैं तुम्हें अभी मुनक्का और चने लाकर देती हूं। मेरा इकलौता बेटा मर गया है। मैं उसके लिए कफन लेने जा रही थी, मगर अब पहले तुम्हारा काम करूंगी।”
उस स्त्री ने व्यापारी से दो पैसे लिए और बाजार से चने और मुनक्का लेकर आई और स्वयं भी बृहस्पति देवता की कथा सुनी। कथा समाप्त होने के बाद वह अपने पुत्र के लिए कफन लेकर घर रवाना हुई।
रास्ते में उसने देखा कि लोग उसके बेटे की लाश को “राम नाम सत्य है” कहते हुए श्मशान की ओर ले जा रहे हैं।
उस स्त्री ने लोगों से कहा — “भाइयों, मुझे अपने लाडले बेटे का मुख तो देख लेने दो।” लोगों ने अर्थी को जमीन पर रख दिया। तब उस स्त्री ने अपने मृत पुत्र के मुख में प्रसाद और अमृत डाला।
प्रसाद और अमृत पड़ते ही उसका पुत्र उठ खड़ा हुआ और अपनी माता से गले लग गया।
दूसरी स्त्री, जिसने बृहस्पति देवता का निरादर किया था, जब वह बाजार से कपड़े लेकर लौटी और उसका पुत्र घोड़ी पर बैठकर बारात में जाने लगा, तभी घोड़ी ने ऐसी छलांग मारी कि वह गिर पड़ा और कुछ ही क्षणों में उसकी मृत्यु हो गई।
तब वह स्त्री रो-रोकर बृहस्पति देवता से प्रार्थना करने लगी — “हे देव! मेरा अपराध क्षमा करो।”
उसकी प्रार्थना सुनकर भगवान बृहस्पति साधु का रूप धारण कर वहां आए और बोले — “देवी, अधिक विलाप की आवश्यकता नहीं। तुमने गुरुवार देवता का निरादर किया था, उसी का यह परिणाम है। जेल जाकर उस भक्त से क्षमा मांगो, सब ठीक हो जाएगा।”
वह स्त्री जेलखाने पहुंची और व्यापारी से हाथ जोड़कर बोली — “भक्तराज! मैंने आपका कहा नहीं माना, इसलिए गुरुवार देवता मुझसे नाराज हो गए।”
व्यापारी ने कहा — “माता, चिंता मत करो। अगले गुरुवार को आकर बृहस्पति देवता की कथा सुनना। तब तक अपने पुत्र के शव को सुगंधित वस्तुओं में सुरक्षित रखो।”
उस स्त्री ने ऐसा ही किया। अगले गुरुवार को वह मुनक्का, चने और पवित्र जल लेकर आई और श्रद्धा से कथा सुनी।
कथा समाप्त होने पर उसने अमृत और प्रसाद अपने पुत्र के मुख में डाला। तुरंत उसके प्राण लौट आए और वह जीवित हो गया। पुत्र को लेकर वह स्त्री प्रसन्न होकर घर लौट गई।
उसी रात राजा को स्वप्न में बृहस्पति देवता ने दर्शन दिए और कहा, “हे राजन, तुमने जिस व्यापारी और उसकी पुत्री को बंदी बनाया है, वे दोनों निर्दोष हैं। उन्हें प्रातः काल मुक्त कर देना।”
राजा ने बृहस्पति देवता के कहे अनुसार ऐसा ही किया और व्यापारी और उसकी पुत्री को सम्मान सहित मुक्त कर दिया।
बृहस्पति देवता अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। इस व्रत के प्रभाव से रोग दूर होते हैं, धन, पुत्र, यश और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। बोलिए, बृहस्पति देवता की जय।
बृहस्पतिवार की दूसरी कथा
एक दिन देवराज इंद्र अहंकार वश अपने सिंहासन पर बैठे थे। उसी समय देवगुरु बृहस्पति पर इंद्र ने उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया। इसे अनादर समझकर बृहस्पति देव वहां से चले गए।
बाद में इंद्र को अपनी भूल का एहसास हुआ और वे क्षमा मांगने बृहस्पति देव के आश्रम गए, किंतु वे अंतर्ध्यान हो चुके थे।
जब दैत्यों के राजा वृष वर्मा को यह समाचार विदित हुआ तो उसने अपने गुरु श से इंद्रपुरी को चारों तरफ़ से घेर लिया। गुरु की कृपा न होने के कारण देवता हारने व मार खाने लगे।
तब देवताओं ने जाकर ब्रह्मा जी को विनय पूर्वक सब वृतांत सुनाया और निवेदन किया कि महाराज दैत्यों से किसी प्रकार हमारी रक्षा कीजिए। ब्रह्मा जी ने कहा- "तुमने बड़ा अपराध किया है जो गुरुदेव को क्रोधित कर दिया।
त्वष्टा ऋषि के पुत्र विश्व रूपा बड़े तपस्वी ज्ञानी है। उन्हें अपना पुरोहित बनाओ, तभी तुम्हारा कल्याण हो सकता है।"
यह वचन सुनते ही इंद्र त्वष्टा ऋषि के पास गए और विनीत भाव से कहने लगे कि "आप हमारे पुरोहित बन जाएं जिससे हमारा कल्याण हो।" त्वष्टा ऋषि ने उत्तर दिया कि "पुरोहित बनने से तपोबल घट जाता है परंतु तुम बहुत विनती करते हो तो मेरा पुत्र विश्व रूपा पुरोहित बनकर तुम्हारी रक्षा करेगा।"
विश्व रूपा ने पिता की आज्ञा से पुरोहित बनकर ऐसा यत्न किया कि हरि इच्छा से इंद्र वृष वर्मा को युद्ध में जीतकर इंद्रासन पर विराजमान हुए।
विश्व रूपा के तीन मुख थे। एक मुख से वह सोम पल्ली लता का रस निकालकर पीते, दूसरे मुख से मदिरा पीते और तीसरे मुख से अन्न आदि भोजन करते। कुछ दिन के उपरांत इंद्र ने विश्व रूपा से कहा कि में आपकी आज्ञा से यज्ञ करना चाहता हूं।
विश्व रूपा की आज्ञानुसार यज्ञ आरंभ हो गया। एक दैत्य ने विश्व रूपा से आकर कहा कि तुम्हारी माता दैत्य की कन्या है। इस कारण दैत्यों के कल्याण के निमित्त भी एक आहुति दैत्यों के नाम पर दे दिया करो।
विश्व रूपा उस दैत्य का कहा मानकर आहुति देते समय दैत्यों का नाम भी धीरे से लेने लगा। इसी कारण यज्ञ करने से देवताओं का तेज नही बढ़ा ।
इंद्र ने वह वृतांत जानते ही क्रोधित होकर विश्व रूपा के तीनो सिर काट डाले। मद्यपान करने वाले सिर से भंवरा, सोम पल्ली पीने वाले सिर से कबूतर और अन्न खाने वाले सिर से तीतर बन गया।
विश्व रूपा के मरते ही इंद्र का स्वरूप ब्रह्महत्या के प्रभाव से बदल गया। देवताओं द्वारा एक वर्ष तक पश्चाताप करने पर भी ब्रह्महत्या का प्रभाव न छूटा तो सब देवताओं के प्रार्थना करने पर ब्रह्मा जी बृहस्पति देवता सहित वहां आए।
उस ब्रह्महत्या के चार भाग किए। उनमें से एक भाग पृथ्वी को दिया। इसी कारण कही धरती ऊंची तो कहीं नीची और कहीं धरती बीज बोने के लायक भी नहीं होती।
साथ ही ब्रह्मा जी ने यह वरदान भी धरती माता को दिया कि पृथ्वी में अगर कही गड्ढा होगा तो कुछ समय पाकर वह स्वयं ही भर जाएगा। ब्रह्महत्या का दूसरा भाग वृक्षों को दिया जिससे उनमें से गोंद बनकर बहता है।
इस कारण गूगल के अतिरिक्त सभी गोंद अशुभ समझे जाते है। वृक्षों को यह वरदान दिया कि ऊपर से सुख जाने पर भी जड़ फिर से फूट जायेगी।
ब्रह्महत्या का तीसरा भाग स्त्रियों को दिया, इसी कारण स्त्रियां हर महीने रजस्वला होकर पहले दिन चंडालनी, दूसरे दिन ब्रह्मघाटिनी और तीसरे दिन धोबिन के समान रहकर चौथे दिन शुद्ध होती है। साथ ही उनको संतान प्राप्ति का वरदान दिया।
ब्रह्महत्या का चौथा भाग जल को दिया गया जिससे फेन और सिवाल आदि जल के ऊपर आ जाते है। जल को यह वरदान मिला कि जल को जिस भी चीज में डाला जायेगा, वह बोझ में बढ़ जाएगी। इस प्रकार इंद्र को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त किया।
जो मनुष्य इस कथा को पढ़ता या सुनता है, उसके सब पाप बृहस्पति जी महाराज की कृपा से नष्ट हो जाते है। प्रेम से बोलिए, बृहस्पति देवता की जय।
बृहस्पति वार (गुरुवार) की आरती
गुरुवार, अप्रैल 02, 2026
बुधवार व्रत कथा, पूजा विधि, नियम और लाभ | Budhvar Vrat Katha
बुध ग्रह की शांति और समस्त सुखों की इच्छा रखने वाले सभी स्त्री पुरुषों को बुधवार का व्रत करना चाहिए। सफेद फूल, सफेद वस्त्र और सफेद चंदन से बुध देव जी महाराज की पूजा करनी चाहिए और बुधवार की कथा पढ़नी या सुननी चाहिए। बुधवार के व्रत वाले दिन एक बार ही भोजन करना चाहिए।
बुधवार के व्रत के दिन हरी खाद्य वस्तुओं जैसे हरी सब्जियां, मूंग की दाल, पालक, हरे अंगूर आदि का सेवन करना अच्छा माना जाता है। बुधवार की कथा और आरती के बाद स्वयं और परिवार में प्रसाद का वितरण करें।
बुधवार व्रत कथा
एक व्यक्ति अपनी पत्नी को विदा करवाने अपनी ससुराल गया। कुछ दिन रहने के बाद उसने अपने सास- ससुर से अपनी पत्नी को विदा करने के लिए कहा।
उसके सास- ससुर तथा अन्य संबंधियों ने कहा कि आज बुधवार का दिन हैं, आज के दिन यात्रा नहीं करते। वह व्यक्ति नहीं माना और हठधर्मी से बुधवार के दिन ही अपनी पत्नी को विदा करवाकर अपने नगर को चल दिया।
रास्ते में उसकी पत्नी को बहुत जोर से प्यास लगी तो उसने अपने पति से कहा कि मुझे बहुत जोर से प्यास लगी है। वह व्यक्ति हाथ मैं लोटा लेकर गाड़ी से उतरकर जल लेने चला गया।
जब वह जल लेकर वापिस आया तो यह देखकर आश्चर्य चकित रह गया कि बिल्कुल उसकी जैसी शक्ल सूरत का एक व्यक्ति और बिल्कुल उसी के जैसी वेशभूषा पहने एक व्यक्ति गाड़ी मैं उसकी पत्नी के बगल में बैठा हुआ हैं।
यह देखकर वह व्यक्ति बहुत क्रोधित हुआ और उस व्यक्ति से बोला "तुम कौन हो जो मेरी पत्नी के निकट बैठे हो?" इस पर उस की पत्नी के पास बैठा व्यक्ति बोला " यह मेरी पत्नी है और मैं अभी- अभी इसे ससुराल से विदा करवाकर ला रहा हूं ।"
वो दोनो व्यक्ति आपस में झगड़ने लगे। तभी राज्य के सिपाही आए और उन्होंने उस लोटा लेकर पानी लेने गए असली व्यक्ति को ही पकड़ लिया तथा उस स्त्री से पूछा "तुम्हारा असली पति कौन सा है ?"
उसकी पत्नी शांत ही रही क्योंकि वह पहचान ही नही पा रही थी कि उसका असली पति कौन सा हैं, क्योंकि देखने में दोनों व्यक्ति बिल्कुल एक जैसे ही थे और उनकी वेशभूषा भी बिल्कुल एक जैसी थी।
असली वाला व्यक्ति मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने लगा कि "हे भगवन ! यह क्या लीला है कि सच्चा झूठा बन रहा है।" तभी आकाशवाणी हुई कि हे मूर्ख आज बुधवार के दिन तुझे गमन नहीं करना था।
तुम्हें सभी ने बहुत समझाया परंतु तुमने किसी की बात नही मानी। यह सब लीला बुधदेव भगवान की ही हैं।
उस व्यक्ति ने बुधदेव जी महाराज से प्रार्थना की और अपनी गलती के लिए क्षमा की याचना की। तब मनुष्य के रूप में आए भगवान बुधदेव जी उसे दर्शन देकर और क्षमा कर अंतर्ध्यान हो गए।
वह व्यक्ति बुधदेव की कथा कहते हुए अपनी पत्नी के साथ सकुशल घर लौट आया। इस के बाद दोनों पति पत्नी नियम पूर्वक बुधवार का व्रत और उद्यापन करने लगे और सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगे।
जो व्यक्ति इस कथा को सुनता है या दूसरो को सुनाता है, उसको बुधवार के दिन यात्रा करने का कोई दोष नही लगता है और सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है।
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बुधवार की आरती
मंगलवार, मार्च 31, 2026
Gudiya Date 2026: गुड़िया कब है 2026
Gudiya Kab Hai 2026: हर वर्ष संपूर्ण भारतवर्ष में श्रावण मास की शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी का त्यौहार मनाया जाता है। आप जानते ही है कि भारत त्योहारों का देश है और यहां हर त्यौहार बड़ी ही श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है।
उत्तर प्रदेश (यूपी) में इस दिन एक अनोखी परंपरा मनाई जाती है खासतौर पर कानपुर और इसके आसपास के क्षेत्रों में। इस दिन गुड़िया को पीटने की परंपरा निभाई जाती है जो कि एक प्राचीन कहानी पर आधारित है।
नागपंचमी पर क्या है गुड़िया को पीटने की परंपरा?
एक कहानी के अनुसार एक लड़की का भाई भगवान शिव का परम भक्त था और वह प्रतिदिन भगवान भोलेनाथ के मंदिर जाया करता था और श्रद्धापूर्वक भगवान शिव की पूजा अर्चना किया करता था।
भगवान शिव के मंदिर में उसे हर रोज 'नाग देवता' के दर्शन होते थे। वह लड़का रोज नाग देवता को दूध पिलाने लगा और धीरे धीरे दोनों में काफी प्रेम हो गया।
नाग देवता को उस लड़के से इतना प्रेम और विश्वास हो गया कि वो अपनी मणि छोड़ इस लड़के के पैरों से लिपट जाता था।
एक दिन श्रावण के महीने में दोनों भाई बहन एक साथ भगवान भोलेनाथ के मंदिर गए। मंदिर में जाते ही 'नाग' देवता लड़के को देखते ही उसके पैरों से लिपट गया।
लड़के की बहन ने जब यह नज़ारा देखा तो वह बहुत डर गई।उसे लगा कि नाग उसके भाई को डस लेगा। तब लड़की ने अपने भाई की जान बचाने के लिए नाग को डंडे से पीट पीट कर मार डाला।
इसके बाद जब लड़के ने पूरी कहानी अपनी बहन को बताई तो वह रोने लगी। वहां उपस्थित लोगों ने कहा कि 'नाग' देवता का रूप होते है, इसलिए तुम्हें इसका दंड तो अवश्य मिलेगा।
परंतु तुमसे यह पाप अनजाने में हुआ है क्योंकि तुम ने भय वश अपने भाई की जान बचाने के लिए नाग हत्या की है। इसलिए भविष्य में लड़की की जगह कपड़े की बनी हुई गुड़िया को पीटा जायेगा। इस तरह से गुड़िया पीटने की परंपरा शुरू हुई।
उत्तर प्रदेश के कानपुर और इसके आसपास के क्षेत्रों में खासतौर पर नागपंचमी के दिन पतंगे उड़ाई जाती है और गुड़ियों को पीटा जाता है। मान्यता के अनुसार इस दिन बहनें कपड़े की गुड़िया सड़क पर डालती है और भाई उस गुड़िया को डंडों से पीटते है।
इस परंपरा से जुड़ी एक अन्य कहानी के अनुसार तक्षक नाग के काटने से राजा परीक्षित की मृत्यु हो गई थी। समय बीतने पर तक्षक की चौथी पीढ़ी की कन्या का विवाह राजा परीक्षित की चोथी पीढ़ी में हुआ।
उस कन्या ने अपनी ससुराल में एक महिला को इस रहस्य के बारे में बताकर किसी को भी इस बारे में न बताने को कहा, लेकिन उस महिला ने किसी और को बता दिया और धीरे धीरे यह खबर पूरे नगर में फैल गई।
तक्षक के तत्कालीन राजा ने इस रहस्य को उजागर करने पर नगर की सभी लड़कियों को इकठ्ठा करके कोड़ों से पिटवा कर मरवा दिया। राजा इस बात से क्रोधित हो गया था कि औरतों के पेट में कोई बात नही पचती है।
नाग पंचमी 2026 (Nag Panchami 2026)
सावन के महीने में वैसे तो दो नागपंचमी की तिथि आती है, एक कृष्ण पक्ष और दूसरी शुक्ल पक्ष की, परंतु श्रावण माह में शुक्ल पक्ष की नागपंचमी का विशेष महत्व है।
हिंदू मान्यताओं के अनुसार नाग को देवता माना जाता है। श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की नागपंचमी इस साल 17 अगस्त सोमवार 2026 को मनाई जाएगी।
नाग पंचमी तिथि और मुहूर्त (Nag Panchmi Date and Muhurat)
शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का आरंभ 16 अगस्त 2026 रविवार को शाम 04 बज कर 52 मिनट से होगा और समाप्ति 17 अगस्त 2026 को शाम 5:00 पर होगी।
नागपंचमी शुक्ल पक्ष 2026 का पूजा मुहूर्त सोमवार 17 अगस्त 2026 को सुबह 06 बज कर 05 मिनट से सुबह 8 बज कर 40 मिनट तक रहेगा। ऐसे में नागपंचमी का व्रत 17 अगस्त 2026 सोमवार को रखा जाएगा।
नागपंचमी की पूजा विधि (Nag Panchmi ki Puja Vidhi)
नागपंचमी के दिन नाग देवता की पूजा की जाती है। नागपंचमी के दिन वासुकी, अनंत, पद्म, महापद्म, तक्षक, कुलिर, कर्कट, शंख नामक अष्ट नाग देवताओं की पूजा विशेष रूप से की जाती है।
नागपंचमी से एक दिन पहले अर्थात चतुर्थी तिथि को एक समय भोजन करना चाहिए। अगले दिन पंचमी तिथि को नागपंचमी का व्रत रखना चाहिए। व्रत की समाप्ति के पश्चात पंचमी तिथि की रात्रि को भोजन किया जा सकता है।
नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा करने के लिए सबसे पहले एक लकड़ी की चौकी लेकर उस पर मिट्टी से नाग देवता की आकृति (प्रतिमा) बनाएं। इसके बाद नाग देवता पर हल्दी, सिंदूर, अक्षत (बिना टूटा हुआ साबुत चावल) और फूल अर्पित करें।
इसके बाद कच्चे दूध अर्थात बिना गर्म किए हुए दूध में थोड़ा सा घी और चीनी मिलाकर नाग देवता का अभिषेक करें और शेषनाग देवता और भगवान शिव का स्मरण करें।
पूजा समाप्ति के बाद अंत में नाग देवता की कथा का पाठ करें और आरती पढ़ें और किसी जरूरतमंद व्यक्ति को यथा शक्ति दान दे।
नागपंचमी की कथा
प्राचीन समय में एक सेठ के सात पुत्र थे और सभी का विवाह सम्पन्न हो चुका था। सेठ के सबसे छोटे बेटे की पत्नी बहुत ही अच्छे चरित्र और नेक दिल थी, परंतु उसका कोई भाई नहीं था और इस कारण वह अक्सर उदास हो जाया करती थी।
एक दिन घर की सबसे बड़ी बहू ने घर को पीली मिट्टी से लीपने के लिए सभी बहुओं को अपने साथ चलने को कहा। सभी बहुएं हाथ में खुरपी और परात लेकर पास में ही जाकर मिट्टी खोदने लगी।
जब वे मिट्टी खोद रही थी, तभी वहां मिट्टी के नीचे से एक सांप निकल आया जिसे बड़ी बहू खुरपी से मारने लगी। यह देखकर छोटी बहु ने उसे रोकते हुए कहा, मत मारो इसे, यह बेचारा निरपराध है।
यह सुनकर बड़ी बहू ने उसे नही मारा और वह सर्प एक और जा बैठा। तब छोटी बहु ने उस सर्प से कहा कि हम अभी लौट कर आती है, तुम यहां से जाना मत।
यह कहकर वह सबके साथ मिट्टी लेकर घर चली गई और घर के कामकाज में फंसकर सर्प से जो वादा किया था, उसे भूल गई।
दूसरे दिन उसे वह बात याद आई तो वह सब को साथ लेकर वहां पहुंची और सर्प को उसी स्थान पर बैठा देखकर बोली सर्प भैया नमस्कार ! सर्प ने कहा, तू मुझे भैया कह चुकी है, इसलिए तुझे छोड़ देता हूं, नहीं तो झूठी बात करने के कारण तुझे अभी डस लेता।
वह बोली-भैया, मुझसे भूल हो गई, इसलिए क्षमा मांगती हूं। तब सर्प बोला- अच्छा, तू आज से मेरी बहन हुई और मैं तेरा भाई हुआ। तुझे जो मांगना है, मांग ले। वह बोली-भैया, मेरा कोई नहीं है, अच्छा हुआ जो तू मेरा भाई बन गया।
कुछ दिन बीतने के बाद वह सर्प मनुष्य का रूप धारण करके उसके घर आया और बोला कि मेरी बहन को भेज दो। सबने कहा कि इसके तो कोई भाई नहीं था, तो वह बोला कि में दूर के रिश्ते में इसका भाई हूं। बचपन में ही बाहर चला गया था।
उसके विश्वास दिलाने पर घर के लोगो ने छोटी बहू को उसके साथ भेज दिया। उसने रास्ते में छोटी बहू को बताया कि में वही सर्प हूं, इसलिए तुम डरना नहीं और जहां पर चलने में कठिनाई हो, मेरी पूंछ पकड़ लेना।
छोटी बहू ने उसके कहे अनुसार ही किया और इस प्रकार वह उसके घर पहुंच गई। वहां का धन ऐश्वर्य को देखकर वह चकित रह गई।
एक दिन सर्प की माता ने उससे कहा- में एक जरूरी काम से बाहर जा रही हूं, तू अपने भाई को ठंडा दूध पिला देना। उसे यह बात याद नहीं रहीं और उसने सर्प भाई को गर्म दूध पिला दिया, जिससे सर्प का मुंह बुरी तरह से जल गया।
यह देखकर सर्प की माता बहुत क्रोधित हुई, परंतु सर्प के समझाने पर वह शांत हो गई। तब सर्प ने कहा कि बहन को अब उसके घर भेज देना चाहिए।
तब सर्प और उसके पिता ने उसे बहुत सारा सोना, चांदी, जवाहरात, वस्त्र और आभूषण देकर सम्मान सहित सर्प भाई उसे उसके घर छोड़ने आया।
इतना ढेर सारा धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या से कहा कि तेरा भाई तो बड़ा धनवान है, तुझे तो उससे और भी धन लाना चाहिए।
सर्प ने यह वचन सुना तो सब वस्तुएं सोने की लाकर दे दी। यह देखकर बड़ी बहू ने कहा- इन वस्तुओं को झाड़ने के लिए झाडू भी सोने की होनी चाहिए। तब सर्प ने झाड़ू भी सोने की लाकर रख दी।
सर्प ने छोटी बहू को हीरे मणियों का एक अद्भुत हार दिया था। उस हार की प्रशंसा उस देश की रानी ने भी सुनी और वह राजा से बोली कि सेठ की छोटी बहू का हार यहां आना चाहिए।
राजा ने अपने मंत्री को आदेश दिया कि सेठ के घर जाकर उससे वह हार लेकर शीघ्र ही मेरे सामने उपस्थित हो। मंत्री ने सेठ जी के घर जाकर सेठ जी से कहा कि महारानी जी आपकी छोटी बहू का हार पहनेंगी। सेठ जी ने राज भय के कारण छोटी बहू से हार मंगवा कर मंत्री को दे दिया।
छोटी बहू को यह बात बहुत बुरी लगी। उसने अपने सर्प भाई को याद किया और सर्प भाई के आने पर प्रार्थना की- हे भैया, रानी ने आपका दिया हुआ हार मुझसे छीन लिया है।
तुम कुछ ऐसा करो कि जब वह हार उसके गले में हो तो वह हार सर्प बन जाए और जब रानी मुझे मेरा वह हार वापिस लौटा दे तो हीरे और मणियों का हो जाए।
सर्प ने ठीक वैसा ही किया। जैसे ही रानी ने वह हीरे मणियों वाला हार पहना, वैसे ही वह हार सर्प बन गया। यह देख कर रानी चीख पड़ी और जोर जोर से रोने लगी।
यह देखकर राजा ने सेठ के पास खबर भेजी कि छोटी बहू को तुरंत भेजो। सेठ जी डर गए कि राजा न जाने क्या करेगा। सेठ जी छोटी बहू को साथ लेकर राजा के सामने उपस्थित हुए।
राजा ने छोटी बहू से पूछा- तूने क्या जादू किया है, मैं तुझे दंड दूंगा। छोटी बहू बोली- राजन! धृष्टता क्षमा कीजिए। यह हार ही ऐसा है कि मेरे गले में हीरे और मणियों का रहता है और दूसरे के गले में सर्प बन जाता है।
यह सुनकर राजा ने वह सर्प बना हार उसे देकर कहा कि इसे अभी मेरे सामने पहन कर दिखाओ। जैसे ही छोटी बहू ने वह सर्प बना हार अपने गले में डाला, वह हीरे मणियों के हार में बदल गया।
यह देखकर राजा को उसकी बात पर विश्वास हो गया और उसने प्रसन्न होकर बहुत सी स्वर्ण मुद्राएं छोटी बहू को पुरुस्कार में दी। छोटी बहू खुशी-खुशी अपने हार, स्वर्ण मुद्राएं और अपने ससुर के साथ अपने घर लौट आई।
उसके धन को देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या से उसके पति को सिखाया कि छोटी बहू के पास कहीं से बहुत धन आया है। यह सुनकर उसके पति ने अपनी पत्नी को बुलाया और कहा — ठीक-ठीक बता कि तुझे यह धन कौन देता है?
तब वह सर्प भाई को याद करने लगी। उसी समय सर्प ने प्रकट होकर कहा — यदि कोई मेरी धर्म बहन के आचरण पर संदेह करेगा, मैं उसे खा लूंगा।
यह सुनकर छोटी बहू का पति बहुत प्रसन्न हुआ और उसने सर्प देवता का बहुत आदर-सत्कार किया। उसी दिन से नाग पंचमी का त्यौहार मनाया जाता है और स्त्रियां सर्प को भाई मानकर उसकी पूजा करती हैं।
नाग पंचमी की आरती
श्री नागदेव आरती पंचमी की कीजे
तन मन धन सब अर्पण कीजे
नेत्र लाल भिरकुटी विशाला
चले बिन पैर सुने बिन काना
उनको अपना सर्वस्व दीजे
पाताल लोक में तेरा वासा
शंकर विघ्न विनायक नासा
भक्तों का सर्व कष्ट हर लीजे
वेद पुराण सब महिमा गावे
नारद शारद शीश निवांवे
सावल सा से वर तुम दीजे
नौंवी के दिन ज्योत जगावें
खीर चूरमे का भोग लगावे
रामनिवास तन मन धन सब अर्पण कीजे
आरती श्री नागदेव की कीजे
नाग पंचमी का महत्व (Importance of Nag Panchmi)
हिंदू मान्यताओं के अनुसार नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा करने से व्यक्ति को नाग भय नहीं रहता और सर्पदंश से रक्षा होती है।
जिन लोगों की जन्म पत्रिका में कालसर्प दोष होता है, उन्हें सावन माह की शुक्ल पक्ष की नाग पंचमी के दिन पूजा करने से कालसर्प दोष से राहत मिलती है।
इस दिन यदि भगवान शिव के मंदिर में जाकर शिवलिंग पर विराजमान शेषनाग देवता को कच्चे दूध से नहलाया जाए और दूध चढ़ाया जाए, तो दिव्य कृपा प्राप्त होती है। इस दिन घर के दरवाजे पर सांप का चित्र बनाने की भी परंपरा है।
नाग देवता को धनदायक देवता भी कहा जाता है। मान्यता है कि जहां भूमिगत धन होता है, वहां सर्प की उपस्थिति होती है। नाग देवता की पूजा करने से धन प्राप्ति के योग बनते हैं।




