सोलह सोमवार व्रत कथा: Vrat Katha, Vidhi, Niyam, Aarti

सोलह सोमवार व्रत सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाला व्रत है। मनोरथ सिद्धि के लिए सोमवार के दिन भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती का आशीर्वाद के लिए सोलह सोमवार का व्रत रखा जाता है। खासकर कुंवारी कन्याएं मनपसंद वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत को रखती हैं।

सोलह सोमवार व्रत कथा के लिए भगवान शिव का चित्र

सोलह सोमवार व्रत की कथा (Solah Somvar Vrat Katha)

मृत्यु लोक में भ्रमण करने की इच्छा करके एक समय श्री भूतनाथ भगवान भोलेनाथ माता पार्वती के साथ मृत्यु लोक में पधारे। भ्रमण करते-करते दोनों विदर्भ देश के अंतर्गत अमरावती नाम की अति सुंदर नगरी में पहुंचे।

अमरावती नगरी अमरा पुरी के समान सब प्रकार के सुखों से परिपूर्ण थी। उसमें वहां के राजकुमार द्वारा बनवाया गया अति रमणीक शिव जी का मंदिर भी था। भगवान शंकर भगवती पार्वती के साथ उस मंदिर में निवास करने लगे।

एक समय माता पार्वती भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न देख मजाक करने की इच्छा से बोलीं - "हे प्रभु महाराज! आज तो हम दोनों चौसर खेलेंगे।" शिव जी ने अपनी प्राण प्रिय पत्नी की बात को मान लिया और चौसर खेलने लगे।

उसी समय उस मंदिर का पुजारी ब्राह्मण मंदिर में पूजा करने आया। माता पार्वती ने पुजारी से प्रश्न किया - "पुजारी जी बताओ, इस बाजी में हम दोनों में से किसकी जीत होगी।" ब्राह्मण बिना कुछ सोचे-विचारे शीघ्रता से बोल उठा कि महादेव की जीत होगी।

थोड़ी देर में बाजी समाप्त हो गई और पार्वती जी की विजय हुई। पार्वती जी बहुत क्रोधित हुईं और ब्राह्मण को झूठ बोलने के अपराध के कारण श्राप देने को उद्धत हुईं। भोलेनाथ ने माता पार्वती को बहुत समझाया परंतु उन्होंने ब्राह्मण को कोढ़ी होने का श्राप दे ही दिया।

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कुछ समय बाद पार्वती जी के श्रापवश पुजारी के शरीर में कोढ़ पैदा हो गया। वह अनेक प्रकार से दुखी रहने लगा। पुजारी को श्राप-कष्ट भोगते हुए जब बहुत दिन हो गए तब एक दिन देवलोक की अप्सराएं शिवजी की पूजा हेतु उस मंदिर में पधारीं। पुजारी के कोढ़ के कष्ट को देखकर उन्होंने बड़े दया भाव से उसके रोगी होने का कारण पूछा।

पुजारी ने निःसंकोच सारी बात उन्हें बता दी। वे अप्सराएं बोलीं- "हे पुजारी! अब तुम अधिक दुखी मत होना, भगवान शिव तुम्हारे कष्ट को दूर कर देंगे। तुम सब व्रतों में श्रेष्ठ सोलह सोमवार का व्रत भक्ति भाव से किया करो।"

सोलह सोमवार व्रत विधि (16 Somvar Vrat Vidhi)

पुजारी ने अप्सरा से विनम्र भाव से सोलह सोमवार व्रत विधि पूछी। अप्सरा ने पुजारी को बताया - सोमवार को भक्ति भाव के साथ व्रत करें। स्नान उपरांत स्वच्छ वस्त्र पहनें।

संध्या व उपासना के बाद आधा सेर गेहूं का आटा लें और उसके 3 भाग करें। घी, गुड़, दीप, धूप, नैवेद्य, सुपारी, बेलपत्र, जनेऊ का जोड़ा, चंदन, अक्षत, पुष्प आदि के द्वारा प्रदोष काल में भगवान शंकर का विधि से पूजन करें।

तत्पश्चात तीन भागों में से एक भाग शिवजी को अर्पण करें और बाकी दो भागों को शिव जी का प्रसाद समझकर उपस्थित भक्तजनों में बांट दें और आप भी प्रसाद ग्रहण करें। इस विधि से सोलह सोमवार व्रत करें।

17वें सोमवार को पाव सेर पवित्र गेहूं के आटे की बाटी बनाएं। उसमें घी और गुड़ मिलाकर चूरमा बनाएं। भगवान भोलेनाथ को भोग लगाकर उपस्थित भक्तों में बांटें। इसके बाद कुटुंब सहित प्रसाद ग्रहण करें तो शिव जी की कृपा से उसके सभी मनोरथ पूरे हो जाते हैं।

ऐसा कहकर अप्सराएं स्वर्ग लोक को चली गईं। ब्राह्मण ने यथा विधि सोलह सोमवार व्रत किया तथा भगवान शिव की कृपा से रोग मुक्त होकर आनंद से रहने लगा।

कुछ दिन बाद शिवजी और माता पार्वती फिर उस मंदिर में पधारे। ब्राह्मण को निरोग देख पार्वती जी ने ब्राह्मण से रोग मुक्त होने का उपाय पूछा तो ब्राह्मण ने सोलह सोमवार व्रत की कथा सुनाई।

पार्वती जी अति प्रसन्न हो ब्राह्मण से व्रत की विधि पूछकर स्वयं व्रत करने को तैयार हो गईं। व्रत करने के बाद उनकी मनोकामना पूर्ण हुई तथा उनके रूठे हुए पुत्र स्वामी कार्तिकेय स्वयं माता के आज्ञाकारी हुए।

कार्तिकेय जी को अपने इस विचार परिवर्तन का रहस्य जानने की इच्छा हुई। वे माता से बोले- "हे माता! आपने ऐसा कौन सा उपाय किया जिससे मेरा मन आपकी ओर आकर्षित हुआ।" पार्वती जी ने वही सोलह सोमवार व्रत की कथा उनको सुनाई।

कार्तिकेय जी ने कहा- "इस व्रत को तो मैं भी करूंगा क्योंकि मेरा प्रिय मित्र ब्राह्मण बिछड़ गया है। मेरी उससे मिलने की बहुत इच्छा है।" कार्तिकेय जी ने भी यह व्रत किया और उनका प्रिय मित्र मिल गया। मित्र ने इस आकस्मिक मिलन का रहस्य कार्तिकेय जी से पूछा तो वे बोले, "हे मित्र! हमने तुम्हारे मिलने की इच्छा से सोलह सोमवार का व्रत किया था।"

अब तो ब्राह्मण मित्र को अपने विवाह की बड़ी इच्छा हुई। उसने कार्तिकेय जी से व्रत की विधि पूछी और यथा विधि व्रत किया। व्रत के प्रभाव से जब वह किसी कार्यवश विदेश गया तो वहां के राजा की लड़की का स्वयंवर था।

राजा ने प्रण किया था कि जिस राजकुमार के गले में सब प्रकार से श्रृंगारित हथिनी माला डालेगी, मैं उसी के साथ अपनी प्यारी पुत्री का विवाह कर दूंगा। शिव जी की कृपा से वह ब्राह्मण भी स्वयंवर देखने की इच्छा से राजसभा में एक ओर बैठ गया।

नियत समय पर हथिनी आई और उसने जयमाला उस ब्राह्मण के गले में डाल दी। राजा ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार बड़ी धूमधाम से अपनी कन्या का विवाह उस ब्राह्मण के साथ कर दिया। ब्राह्मण को बहुत सा धन और सामान देकर संतुष्ट किया। ब्राह्मण सुंदर राजकन्या पाकर सुख से जीवन व्यतीत करने लगा।

एक दिन राजकन्या ने अपने पति से प्रश्न किया- "हे प्राणनाथ! आपने ऐसा कौन सा भारी पुण्य किया था जिसके प्रभाव से हथिनी ने सब राजकुमारों को छोड़कर आपको वरण किया?" ब्राह्मण बोला- "हे प्राण प्रिये! मैंने अपने मित्र कार्तिकेय जी के कहे अनुसार सोलह सोमवार का व्रत किया था जिसके प्रभाव से मुझे तुम जैसी रूपवान पत्नी की प्राप्ति हुई है।" व्रत की महिमा सुनकर राजकन्या को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह भी पुत्र की कामना करके व्रत करने लगी।

शिव जी की दया से उसके गर्भ से एक अति सुंदर, सुशील, धर्मात्मा और विद्वान पुत्र उत्पन्न हुआ। माता-पिता दोनों उस देवपुत्र को पाकर अति प्रसन्न हुए और उसका लालन-पालन भली प्रकार से करने लगे।

जब पुत्र समझदार हुआ तो एक दिन उसने अपनी माता से प्रश्न किया- "हे मां! तुमने ऐसा कौन सा व्रत एवं तप किया है जो मेरे जैसा पुत्र तुम्हारे गर्भ से उत्पन्न हुआ।" माता ने सोलह सोमवार व्रत की कथा पुत्र को बताई। पुत्र ने सब तरह के मनोरथ पूर्ण करने वाले सरल व्रत को सुना तो वह भी राज्य पर अधिकार पाने की इच्छा से हर सोमवार को यथा विधि यह व्रत करने लगा।

व्रत शुरू होने के बाद एक देश के वृद्ध राजा के दूतों ने आकर उसको राजकन्या के लिए वरण किया। राजा ने अपनी पुत्री का विवाह ऐसे सर्वगुण संपन्न ब्राह्मण युवक के साथ करके बड़ा सुख प्राप्त किया। वृद्ध राजा के दिवंगत हो जाने पर इसी ब्राह्मण युवक को सिंहासन पर बैठाया गया क्योंकि दिवंगत राजा के कोई पुत्र नहीं था।

राज्य का उत्तराधिकारी होकर भी ब्राह्मण पुत्र सोलह सोमवार का व्रत करता रहा। जब सत्रहवां सोमवार आया तो विप्र पुत्र ने अपनी पत्नी से पूजन सामग्री लेकर शिव पूजा के लिए शिवालय में चलने को कहा। परंतु उसकी पत्नी ने उसकी आज्ञा की परवाह नहीं की और दास-दासियों द्वारा सब सामग्री शिवालय भिजवा दी, परंतु स्वयं नहीं गई।

जब राजा ने शिवजी का पूजन समाप्त किया, तब आकाशवाणी हुई- "हे राजा! अपनी इस रानी को राजमहल से निकाल दे, नहीं तो यह तेरा सर्वनाश कर देगी।" आकाशवाणी सुनकर राजा के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उसने मंत्रणा गृह में आकर अपने सभासदों को बुलाकर पूछा, "हे मंत्रियों! मुझे आज शिवजी की आकाशवाणी हुई है कि तुम अपनी इस रानी को निकाल दो, नहीं तो यह तेरा सर्वनाश कर देगी।"

राज्य के मंत्री तथा सभी सदस्य आदि सब विस्मय और दुःख में डूब गए क्योंकि जिस कन्या के कारण राज्य मिला है, राजा उसी को निकालने की बात कर रहा है, यह कैसे हो सकेगा?

राजा ने अपनी पत्नी को राजमहल से निकाल दिया। रानी दुखी हृदय से भाग्य को कोसती हुई नगर के बाहर चली गई। बिना चप्पल, फटे वस्त्र पहने, भूख से दुखी धीरे-धीरे चलकर वह एक गांव में पहुंची।

वहां एक बुढ़िया सूत कातकर बेचने जाती थी। रानी की करुण दशा देखकर बोली- "चल, तुम मेरा सूत बिकवा दे। मैं वृद्ध हूं, भाव नहीं जानती हूं।" यह बात सुन रानी ने बुढ़िया के सिर से सूत की गठरी उतारकर अपने सिर पर रख ली। थोड़ी देर बाद आंधी आई और बुढ़िया का सूत पोटली सहित उड़ गया। बेचारी बुढ़िया पछताती रह गई और रानी को अपने से दूर रहने को कहा।

इसके बाद रानी एक तेली के घर गई तो शिवजी के प्रकोप के कारण तेली के सब मटके उसी क्षण चटक गए। तेली ने भी रानी को अपने घर से निकाल दिया। अत्यंत दुःख पाती हुई रानी एक नदी के तट पर गई तो नदी का समस्त जल सूख गया।

तत्पश्चात रानी एक वन में गई, वहां सरोवर में पानी पीने गई और उसके हाथ का स्पर्श होते ही सरोवर के नील कमल के समान साफ जल में असंख्य कीड़े पैदा होकर गंदा हो गया। रानी ने भाग्य पर दोषारोपण करते हुए उस जल को पीकर पेड़ की शीतल छाया में विश्राम करना चाहा, परंतु रानी जिस पेड़ के नीचे जाती उसी पेड़ के पत्ते तत्काल टूटकर गिर जाते।

वन, सरोवर, जल की ऐसी दशा देख गाय चराते ग्वालों ने अपने गुसाईं जी से, जो उस जंगल में स्थित मंदिर में पुजारी थे, यह बात बताई। गुसाईं जी के आदेश अनुसार ग्वाले रानी को पकड़कर गुसाईं जी के पास लाए। रानी की मुख कांति और शारीरिक शोभा देखकर गुसाईं जी जान गए कि यह अवश्य ही कोई विधि की गति की मारी कुलीन स्त्री है।

पुजारी ने रानी से कहा- "पुत्री! मैं तुमको अपनी पुत्री के समान रखूंगा। तुम मेरे आश्रम में ही रहो। मैं तुमको किसी प्रकार का कष्ट नहीं दूंगा।" गुसाईं जी के वचन सुनकर रानी को धीरज हुआ। वह आश्रम में रहने लगी।

रानी जो भी भोजन बनाती उसमें कीड़े पड़ जाते, जल भरकर लाती तो उसमें भी कीड़े पड़ जाते। रानी की यह दशा देखकर गुसाईं जी भी बहुत दुखी थे, उन्होंने रानी से पूछा, "हे बेटी! तुम्हारे ऊपर कौन से देवता का कोप है जिससे तुम्हारी ऐसी दशा है।"

पुजारी की बात सुन रानी ने शिवजी महाराज के पूजन का बहिष्कार करने की बात बताई तो पुजारी शिव जी महाराज की अनेक प्रकार से स्तुति करते हुए रानी से बोले, "हे पुत्री! तुम सब मनोरथ पूर्ण करने वाले सोलह सोमवार व्रत को करो और उसके प्रभाव से तुम अपने कष्ट से मुक्त हो सकोगी।"

गुसाईं जी की बात मानकर रानी ने सोलह सोमवार व्रत किए, सत्रहवें सोमवार को विधि-विधान सहित पूजन किया। उस पूजन के प्रभाव से राजा के हृदय में विचार उत्पन्न हुआ कि रानी को गए हुए बहुत समय व्यतीत हो गया, न जाने कहां-कहां भटकती होगी, उसे ढूंढना चाहिए। यह सोच रानी को तलाश करने के लिए राजा ने चारों दिशाओं में अपने दूत भेजे। वे दूत रानी को ढूंढते हुए पुजारी के आश्रम में पहुंचे।

वहां रानी को पाकर दूतों ने पुजारी से रानी को अपने साथ ले जाने का आग्रह किया, परंतु पुजारी ने मना कर दिया। दूत चुपचाप लौट आए और महाराज को रानी का पता बतलाया। रानी का पता पाकर राजा स्वयं पुजारी के आश्रम में गए और पुजारी से कहा- "हे महाराज! जो देवी आपके आश्रम में रहती हैं वह मेरी पत्नी है। शिवजी के कोप से मैंने इनको त्याग दिया था। अब इन पर से शिवजी का प्रकोप शांत हो गया है, इसलिए मैं इन्हें लेने आया हूं। आप इनको मेरे साथ जाने की आज्ञा दीजिए।"

गुसाईं जी ने राजा के वचन को सत्य समझकर रानी को राजा के साथ जाने की अनुमति दे दी। गुसाईं जी की आज्ञा पाकर रानी प्रसन्न होकर राजा के साथ महल में आई। नगरवासियों ने नगर द्वार तथा नगर को तोरण, बंदनवारों और बहुत सुंदर ढंग से सजाया। घर-घर में मंगल गान होने लगे। पंडितों ने विविध वेद मंत्रों का उच्चारण कर अपनी राजरानी का स्वागत किया।

इस प्रकार से रानी ने धूमधाम से पुनः अपनी राजधानी में प्रवेश किया। महाराज ने ब्राह्मणों को अनेक तरह से दान आदि देकर संतुष्ट किया। याचकों को धन-धान्य दिया। नगर में स्थान-स्थान पर भोजनालय खुलवाए, जहां भूखों को मुफ्त भरपेट भोजन मिलता था।

इस प्रकार से राजा शिव जी की कृपा का पात्र हो राजधानी में रानी के साथ अनेक तरह के सुखों का भोग करता हुआ सोलह सोमवार का व्रत करने लगा। विधिवत शिव पूजन करते हुए इस लोक में अनेक सुखों को भोगने के पश्चात दोनों शिवपुरी को पधारे।

16 सोमवार व्रत के लाभ (Benefits of 16 Somvar Vrat)

जो मनुष्य मन, वचन, कर्म और भक्ति भाव से सोलह सोमवार का व्रत एवं पूजन इत्यादि विधिवत करता है, वह इस लोक में समस्त सुखों को भोगकर अंत में शिवपुरी को प्राप्त होता है। यह व्रत सब मनोरथों को पूर्ण करने वाला है।

शिव जी की आरती

जय शिव ओंकारा, ॐ जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा। ॐ जय शिव ओंकारा।।

एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे। ॐ जय शिव ओंकारा।।

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे। ॐ जय शिव ओंकारा।।

अक्षमाला वनमाला मुंडमाला धारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी। ॐ जय शिव ओंकारा।।

श्वेतांबर पीतांबर बाघंबर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे। ॐ जय शिव ओंकारा।।

कर के मध्य कमंडल चक्र त्रिशूल धारी।
सुखकारी दुखहारी जग पालन कारी। ॐ जय शिव ओंकारा।।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका। ॐ जय शिव ओंकारा।।

लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा।
पार्वती अर्धांगी, शिवलहरी गंगा। ॐ जय शिव ओंकारा।।

पर्वत सोहे पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा। ॐ जय शिव ओंकारा।।

जटा में गंगा बहत है, गल मुंडन माला।
शेष नाग लिपटाए, ओढ़े मृगछाला। ॐ जय शिव ओंकारा।।

काशी में विराजे विश्वनाथ, नंदी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी। ॐ जय शिव ओंकारा।।

त्रिगुणस्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी सुख संपति पावे। ॐ जय शिव ओंकारा।।

Santoshi Mata Ki Aarti: मैं तो आरती उतारू रे संतोषी माता की

संतोषी माता को हिंदू धर्म में संतोष, शांति और मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाली देवी के रूप में जाना जाता है। हर शुक्रवार को उनकी पूजा और आरती करके परिवार में सुख, शांति और समृद्धि की कामना की जाती है। माना जाता है कि संतोषी माता की आरती श्रद्धापूर्वक गाने से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं और घर में खुशहाली आती है।

संतोषी माता की सुंदर प्रतिमा और आरती का दिव्य दृश्य

संतोषी माता की आरती

जय संतोषी माता जय संतोषी माता
अपने सेवक जन को सुख संपति दाता
जय संतोषी माता

सुंदर चीर सुनहरी मां धारण कीन्हों
हीरा पन्ना दमके तन सिंगार लीन्हों
जय संतोषी माता

गेरू लाल छटा छवि बदन कमल सोहै
मंद हंसत करुणामयी त्रिभुवन मोहै
जय संतोषी माता

स्वर्ण सिंहासन बैठी चंवर ढुरे प्यारे
धूप, दीप, नैवेद्य, मधुमेवा भोग धरे न्यारे
ओम जय संतोषी माता

गुड और चना परमप्रिय तामें संतोष कियो
संतोषी कहलाई भक्तन विभव दियो
जय संतोषी माता

शुक्रवार प्रिय मानत आज दिवस सोही
भक्त मंडली आई कथा सुनत वोही
जय संतोषी माता

मंदिर जगमग ज्योति मंगल ध्वनि छाई
विनय करें हम बालक चरनन सिर नाई
जय संतोषी माता

भक्ति भावमय पूजा अंगीकृत कीजै
जो मन बसे हमारे इच्छा फल दीजै
जय संतोषी माता

दुःखी, दरिद्री, रोगी संकट मुक्त किये
बहु धन धान्य भरे घर सुख सौभाग्य दिये
जय संतोषी माता

ध्यान धरो जो नर तेरो, मनवांछित फल पायो
पूजा कथा श्रवण कर, घर आनंद आयो
जय संतोषी माता

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Sade Sati: कुंभ राशि पर शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव

शनि की साढ़ेसाती एक चुनौतीपूर्ण अवधि मानी जाती है जो लगभग साढ़े सात साल तक चलती है। जैसा कि हम जानते है कि शनि ग्रह एक राशि में 2.5 यानी ढ़ाई साल तक रहते है।

कुंभ राशि पर शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव दर्शाती शनिदेव की दिव्य छवि

इस दौरान जन्म राशि के चंद्र ग्रह से बारहवें, लग्न और दूसरे घर में शनि ग्रह को साढ़े सात साल लगते है। इसी अवधि को साढ़ेसाती कहा जाता है।

वर्तमान में मेष राशि पर साढ़ेसाती का पहला, मीन राशि पर साढ़ेसाती का दूसरा चरण और कुंभ राशि पर साढ़ेसाती का तीसरा या अंतिम चरण चल रहा है।

कुंभ राशि पर साढ़ेसाती का प्रभाव (Sadhe Sati effects on Aquarius)

कुंभ राशि पर शनि की साढ़ेसाती 24 जनवरी 2020 से शुरू हुई थी और कुंभ राशि से शनि की साढ़ेसाती पूरी तरह से 03 जून 2027 को समाप्त होगी।

जैसा कि आप जान ही चुके है, शनि ग्रह एक राशि में 2.5 यानी ढ़ाई साल रहते है और इस तरह से साढ़े सात साल की साढ़ेसाती की अवधि के दौरान तीन चरण आते है।

जिन्हे साढ़ेसाती का पहला, दूसरा और तीसरा चरण कहते है और हर चरण का इस अवधि में अपना प्रभाव रहता है। आइए जानते है संक्षिप्त रूप से साढ़ेसाती के इन तीन चरणों के बारे में

कुंभ राशि पर साढ़ेसाती का पहला चरण (First Phase of Sade Sati) for Aquarius)

साढ़ेसाती के पहले चरण में आर्थिक हानि, छिपे हुए शत्रुओं से हानि, बिना किसी उद्देश्य के यात्रा, विवाद और निर्धनता को दर्शाता है।

इस समय शनि ग्रह आपके मस्तिष्क पर विराजमान रहते है जिससे हर समय सरदर्द या माइग्रेन संबंधित लक्षण प्रकट हो सकते है।

अकारण रोजगार में बाधा उत्पन्न हो जाती है चाहे वो व्यवसाय हो या नौकरी। वैवाहिक संबंधों में तनाव देखा जा सकता है।

घरेलू और व्यवसायिक मामलों में उलझने बढ़ती जाती है,साथ ही मानसिक तनाव और आर्थिक संकट बढ़ते जाते है।

आपकी वाणी पर आपका नियंत्रण नहीं रहता और स्वभाव में गुस्से का असर बढ़ जाता है।

कुंभ राशि पर साढ़ेसाती का दूसरा चरण (Second Phase of Sade Sati for Aquarius)

साढ़ेसाती के दूसरे चरण को सबसे मुश्किल चरण कहा जाता है। इस समय यह जातक के दिल पर होती है और पेट और ह्रदय संबंधित रोग या लक्षण दिखाई दे सकते है।

इस समय चरित्र हनन या मानहानि होना या हर समय इसका अनजाना सा डर बना रहना, रिश्तों में दरार, मानसिक अशांति, डिप्रेशन और दुख की अधिकता बनी रहती है।

कार्यों में बिना मतलब के अड़ंगे लगते रहते है और किसी भी कार्य में सफलता पाने के लिए अत्यधिक मेहनत करनी पड़ती है।

शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आने लगती है। सगे संबंधी, यार दोस्त इस समय आपसे दूरी बना लेते है।

इस समय मानसिक तनाव अपने चरम पर होगा और हर समय अज्ञात भय बना रहेगा। आपके निर्णय लेने की क्षमता में कमी आयेगी और हर समय आलस्य बना रहेगा।

किसी भी कार्य में आपका मन नहीं लगेगा। आप खुद को भीड़ से दूर रखेंगे और हर समय अकेले में रहना पसंद करेंगे।

कुंभ राशि पर साढ़ेसाती का तीसरा चरण (Third Phase of Sade Sati for Aquarius)

साढ़ेसाती के तीसरे चरण में भी पहले और दूसरे चरण वाले लक्षण बने रहते है परंतु आप पहले की अपेक्षा कुछ राहत महसूस करेंगे।

हालांकि इस समय आपको कुछ धन लाभ हो सकता है परंतु आर्थिक समस्याएं और खर्चों की अधिकता बनी रहेगी।

आपकी सोच नकारात्मक हो सकती है और आपके बात करने का लहज़ा सख्त हो सकता है। आपकी राशि से दूसरे भाव में बैठे शनि की सप्तम दृष्टि आपके अष्टम भाव पर रहेगी जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्या हो सकती है खास तौर पर गाड़ी चलाते समय विशेष सावधानी रखे।

परंतु एक बात तय है कि कुंभ राशि पर साढ़ेसाती का ये तीसरा चरण थोड़ा सावधानी बरत कर चलने का जरूर है परंतु ये कुंभ राशि पर उतरती हुई साढ़ेसाती है।

शनि देव ने पिछले पांच सालों यानि पहले और दूसरे चरण में आपको जो हालात की भट्टी में तपा कर सोना बनाया है, उसका फल आपको अवश्य मिलेगा।

ऐसा माना जाता है कि उतरती हुई साढ़ेसाती में शनिदेव आपको वो सब ब्याज सहित लौटा देते है जो इस समय आपने गंवाया होता है चाहे वो धन हो या मान सम्मान।

इस दौरान घर परिवार में अगर कोई मानवीय क्षति हुई हो तो वो तो वापिस नही हो सकती परंतु बाकी सब कुछ आपको अवश्य प्राप्त हो जाता है।

कुंभ राशि से साढ़ेसाती कब हटेगी (When will Sade Sati end for Aquarius)

कुंभ राशि पर इस समय शनि की साढ़ेसाती का तीसरा चरण चल रहा है और साढ़ेसाती के पहले और दूसरे चरण में कुंभ राशि ने जो दुख भोगे है और अपमान के घूंट पिए है और वक्त की चक्की ने कुंभ राशि वालो को ऐसा रगड़ा कि आंख के आंसू तक सूख गए।

परंतु वक्त का पहिया अपनी गति से चलता रहता है और जीवन की इस गाड़ी में सुख दुख आते जाते रहते है। पिछले पांच साल में आपने जो दुख और पीड़ा झेली है, वो कुंभ राशि के जातक ही जानते हैं।

03 जून 2027 को जब कुंभ राशि से साढ़ेसाती पूरी तरह से हट जाएगी और कुंभ राशि के जीवन में छाए अंधेरे के बादल पूरी तरह से हट जाएंगे और एक नया सवेरा आपका इंतजार कर रहा होगा।

हालांकि, कुंभ राशि अभी साढ़ेसाती के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नही हुई है। अभी कुंभ राशि पर साढ़ेसाती का तीसरा चरण चल रहा है।

अभी भी बहुत सी उलझने आपके जीवन में बनी हुई होंगी, परंतु आप पहले के दो चरणों के मुकाबले अभी कुछ राहत महसूस कर रहे होंगे।

बस जरूरत है कुछ समय और शांतिपूर्वक और संभल कर निकालने का। उसके बाद जब कुंभ राशि से साढ़ेसाती पूरी तरह से समाप्त हो जायेगी, तो वक्त का मरहम आपके जीवन के पुराने सब जख्मों को कब भर देगा, इसका पता भी नही चलेगा।

साढ़ेसाती के प्रभाव ( Sade Sati Effects)

शनि की साढ़ेसाती के बारे में आप पहले भी बहुत कुछ जानते होंगे या सुना होगा और हर मनुष्य के जीवन में सामान्य तौर पर दो से तीन बार साढ़ेसाती आती है।

जैसा कि आप जानते है कि शनिदेव एक राशि में ढ़ाई साल रहते है तो बारह राशियों में गोचर करते हुए शनिदेव हर तीस साल के बाद उस राशि में पुन: आते है।

जैसे कि आपकी राशि कुंभ है और आपकी राशि पर शनिदेव की साढ़ेसाती 24 जनवरी 2020 से शुरू हुई थी और शनिदेव के बारह राशियों में गोचर करते हुए लगभग तीस साल बाद अर्थात 2050 में कुंभ राशि पर दुबारा साढ़ेसाती शुरू होगी।

इस प्रकार हम यह कह सकते है कि मनुष्य जीवन में शनिदेव की साढ़ेसाती दो से तीन बार अवश्य ही आती है।शनि साढ़ेसाती के बारे में आपने कुछ कहानियां भी अवश्य ही सुनी होंगी, जो संक्षेप में इस प्रकार है।

राजा विक्रमादित्य की कहानी जिसमे जब राजा विक्रमादित्य पर शनि की साढ़ेसाती आई तो राजा विक्रमादित्य अपने राज पाट से दूर हो गए और उनके हाथ पैर तक काट दिए गए और एक तेली के यहां काम करना पड़ा।

भगवान राम पर जब शनिदेव की साढ़ेसाती आई तो राजा बनने की जगह पत्नी और भाई सहित जंगलों में बनवास करना पड़ा, जंगली कंद मूल खा कर और झोपड़ी बना कर अपना जीवन बसर करना पड़ा, पत्नी वियोग और रावण से युद्ध हुआ।

राक्षसराज रावण पर जब शनि की साढ़ेसाती आई तो रावण की मति भ्रष्ट हो गई और उसने सीता माता का हरण कर लिया और अपनी जिद्द से अपना और अपने कुल का नाश कर लिया।

राजा नल पर जब शनि की साढ़ेसाती आई तो वो जुए में अपना सारा राजपाट हार गए और रानी दमयंती के साथ जंगलों में दर दर की ठोकरें खानी पड़ी। बाद में साढ़ेसाती की समाप्ति पर शनिदेव की मंत्र साधना से अपना खोया हुआ राजपाट पुन: प्राप्त किया।

पांडवो पर जब साढ़ेसाती आई तो जुए में अपना सारा राजपाट हार गए यहां तक कि पत्नी द्रोपदी को भी जुए में हार गए। राजपाट से दूर सभी भाई पत्नी द्रोपदी और माता कुंती के साथ जंगलों में एकांतवास अर्थात छुप कर रहना पड़ा। राजा होकर भी दूसरों की नौकरी करनी पड़ी।

कौरवों पर जब साढ़ेसाती आई तो बुद्धि पूरी तरह से भ्रष्ट हो गई और सगे संबंधियों के बीच महाभारत का युद्ध लड़ा गया जिसमे कौरवों का वंश नाश हो गया और दोनो और से सगे संबंधी और लाखों लोग इस भीषण युद्ध की बलि चढ़ गए।

शनि की साढ़ेसाती के उपाय (Shani ki Sade Sati ke Upay)

शनि की साढ़ेसाती के दुष्प्रभाव से बचने के लिए आप शनिवार को थोड़े से सरसों के तेल में काले तिल और एक लोहे का कील मिला कर भगवान शनिदेव को अर्पित करें, इससे आपको साढ़ेसाती के बुरे प्रभाव से राहत मिल सकती है।

अगर हो सके तो रोजाना, नही तो मंगलवार और शनिवार को हनुमान चालीसा का पाठ करे। ऐसा करने से भी आपको राहत मिलेगी।

शनिवार को जब आप शनिदेव के मंदिर में जाए तो वहां भगवान शनिवार के पैरों में थोड़ा सा सरसों का तेल लेकर मालिश करे और शनिदेव के पैर दबाए।

ऐसा करने से आपको साढ़ेसाती के कष्टों से राहत मिलेगी और मानसिक शांति मिलेगी।

शनिवार को किसी कोढ़ी या भिखारी को काला कम्बल दान करें, ऐसा करने से आपको मानसिक संतोष मिलेगा और साढ़ेसाती के बुरे प्रभाव में कमी महसूस होगी।

भूलकर भी किसी सफाई कर्मी का अपमान न करें और शनिवार या कभी भी उसे अन्न या मिठाई खिलाए या इसका पैसा भी दे सकते है।

निष्कर्ष (Conclusion)

शनिदेव न्याय के देवता है और साढ़ेसाती में जातक को उसके अच्छे बुरे कर्मो का फल प्रदान करते है। अगर आपने बुरे कर्म नहीं किए है तो साढ़ेसाती से आपको ज्यादा डरने की जरूरत नहीं है। इस अवधि में मांस, मदिरा, जुआ और पराई स्त्री से दूर रहें।

इस अवधि में अपना ध्यान आध्यात्मिक कार्यों पर बढ़ाएं और भगवान शनिदेव की पूजा, शनि चालीसा का पाठ और साढ़ेसाती से बचने के उपाय करते रहें। ऐसा मन में विश्वास बनाएं रखें, आपके साथ कुछ भी गलत नहीं होगा।

Ekadashi Kab Hai: एकादशी 2026 लिस्ट हिंदी में

एकादशी हिंदुओं के लिए एक बहुत ही पवित्र दिन है जो कि हर महीने में दो बार अर्थात कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में चंद्रमा के बढ़ते और घटते चरणो के ग्यारहवें दिन होता है। इस दिन काफी हिन्दू एकादशी का व्रत रखते हैं और जगत के पालनकर्ता भगवान विष्णु की पूजा करते हैं।

एकादशी व्रत के दिन शेषनाग पर विराजमान भगवान विष्णु की दिव्य छवि
एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से सभी पाप नष्ट होते हैं।

एकादशी को शरीर को शुद्ध करने और कायाकल्प का दिन माना जाता है। इस दिन उपवास करने वालों के द्वारा पौष्टिक आहार और अनाज का सेव नही किया जाता। इस दिन आप फल सब्जी और दूध से बने खाद्य पदार्थो का सेवन कर सकते हैं। ब्रह्मचर्य का पूर्ण रूप से पालन किया जाता है।

सभी प्रकार के संयम की ये अवधि एकादशी के दिन सूर्योदय से शुरु हो कर एकादशी के अगले दिन सूर्योदय तक रहती है। ऐसा भी माना जाता है कि एकादशी का उपवास करने से हानिकारक ग्रहों के दुष्परिणाम से छुटकारा मिलता है और जीवन में सुख, शान्ति और समृद्धि आती है। एकादशी के व्रत में चावल, दालें, लहसुन, प्याज और मांस मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

एकादशी कब है? एकादशी लिस्ट 2026

जनवरी 2026

एकादशी 2026 तिथि 02 जनवरी सोमवार

पौष पुत्रदा एकादशी

एकादशी का समय 07:11 PM 01 जनवरी से 08:23 PM 02 जनवरी

एकादशी 2026 दिनांक 18 जनवरी बुधवार
षठ टीला एकादशी

एकादशी व्रत 2026 का समय 06:05 PM जनवरी 17 से 04:03 PM जनवरी 18

फरवरी 2026

एकादशी 2026 दिनांक 01 फरवरी बुधवार

जया एकादशी

एकादशी का समय 11:53 AM जनवरी 31 से 02:01 PM 01 फरवरी

एकादशी 2026 दिनांक 16 फरवरी गुरूवार

विजया एकादशी

एकादशी का समय 05:32 AM 16 फरवरी से 02:49 AM 17 फरवरी

मार्च 2026

एकादशी 2026 दिनांक 03 मार्च शुक्रवार

आमलकी एकादशी

एकादशी व्रत 2026 प्रारंभ का समय 06:39 AM 02 march से समाप्ति 09:11 AM 03 मार्च

एकादशी 2023 दिनांक 18 मार्च 2026 शनिवार

पापमोचनी एकादशी

एकादशी का समय 02:06 PM बजे 17 मार्च को सुबह 11:13 AM 18 मार्च

अप्रैल 2026

एकादशी 2026 दिनांक 01 अप्रैल शनिवार

कामदा एकादशी

एकादशी का समय 01:58 AM अप्रैल 01 से 04:19 AM 02 अप्रैल

एकादशी 2026 तिथि 16 अप्रैल रविवार

वरुथिनी एकादशी

एकादशी का समय 15 अप्रैल 08:45 PM से 16 अप्रैल 06:14 PM

एकादशी मई 2026

एकादशी 2026 दिनांक 01 मई सोमवार

मोहिनी एकादशी

एकादशी का समय 30 अप्रैल 08:28 PM से 01 मई 10:09 PM

एकादशी 2026 तिथि 15 मई सोमवार

अपरा एकादशी

एकादशी का समय 15 मई को 02:46 AM se 16 मई 01:03 AM

एकादशी 2026 दिनांक 31 मई बुधवार

निर्जला एकादशी

एकादशी का समय 30 मई 01:07 PM से 31 मई 01:45 PM

जून 2026

एकादशी 2026 दिनांक 14 जून बुधवार

योगिनी एकादशी

एकादशी का समय 09:28 AM 13 जून से 08:48 AM 14 जून

एकादशी 2026 दिनांक 29 जून गुरूवार

एकादशी का नाम देवशयनी एकादशी

एकादशी का समय 03:18 AM 29 जून से 02:42 AM 30 जून

जुलाई 2026

एकादशी 2026 दिनांक 13 जुलाई गुरूवार

कामिका एकादशी

एकादशी का समय 12 जुलाई 05:59 PM से 13 जुलाई 01:05 PM

एकादशी 2026 दिनांक 29 जुलाई शनिवार

पद्मिनी एकादशी

एकादशी का समय 28 जुलाई को 02:51 PM बजे से 29 जुलाई को 01:05 PM

अगस्त 2026

एकादशी 2026 दिनांक 12 अगस्त शनिवार

परमा एकादशी

एकादशी का समय 05:06 AM अगस्त 11 से 06:31 PM 12 अगस्त

एकादशी 2026 दिनांक 27 अगस्त रविवार

श्रवण पुत्रदा एकादशी

एकादशी का समय 12:08 AM अगस्त 27 से 09:32 PM 27 अगस्त

सितंबर 2026

एकादशी 2026 तिथि 10 सितंबर रविवार

अजा एकादशी

एकादशी का समय 07:17 PM 09 सितंबर से 09:28 PM सितंबर 10

एकादशी 2026 तिथि 25 सितंबर मंगलवार

पार्श्व एकादशी

एकादशी का समय 25 सितंबर 07:55 AM से 26 सितंबर 05:00 AM

अक्टूबर 2026

एकादशी 2026 दिनांक 10 अक्टूबर मंगलवार

इंदिरा एकादशी

एकादशी का समय 09 अक्टूबर 12:36 PM बजे से 03:08 PM 10 अक्टूबर

एकादशी 2026 दिनांक 25 अक्टूबर बुधवार

पापंकुशा एकादशी

एकादशी का समय 24 अक्टूबर को 03:14 PM बजे से 25 अक्टूबर 12:32 PM

नवम्बर 2026

एकादशी 2026 तिथि 09 नवंबर गुरूवार

रमा एकादशी

एकादशी का समय 08:23 AM नवंबर 08 से l 10:41 AM 09 नवंबर

एकादशी 2026 दिनांक 23 नवंबर गुरुवार

देवउठनी एकादशी

एकादशी प्रारंभ का समय 11:03 PM 22 नवंबर से समाप्ति 09:01 PM 23 नवंबर

दिसंबर 2026

एकादशी 2026 तिथि 08 दिसंबर शुक्रवार

एकादशी का नाम उत्पन्ना एकादशी

एकादशी का समय 05:06 AM दिसम्बर 08 से 06:31 AM 09 दिसंबर

एकादशी 2026 तिथि 22 दिसंबर शुक्रवार

मोक्षदा एकादशी

एकादशी का समय 08:16 AM दिसम्बर 22 से 07:11 AM 23 दिसंबर

हिंदू कैलेंडर और एकादशी

एक कैलेंडर वर्ष में आमतौर पर 24 एकादशियां आती है अर्थात 12 एकादशी शुक्ल पक्ष की और 12 एकादशी कृष्ण पक्ष की आती है। कभी कभी किसी लीप वर्ष में दो अतिरिक्त एकादशी भी हो सकती है।

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार हर तीन वर्ष में एक अतिरिक्त माह की गणना की जाती है जिसे अधिकमास कहा जाता है। इसे मलमास या पुरषोत्तम मास भी कहते है। इस वर्ष अधिकमास 2023 मंगलवार 18 जुलाई 2023 से बुधवार 16 अगस्त 2023 तक रहेगा। इसलिए वर्ष 2023 में 2 अतिरिक्त अर्थात 26 एकादशी रहेंगी।

हर माह की एकादशी का समय चंद्रमा की ग्रह चाल के अनुसार होता है। हिंदू कैलेंडर पंद्रह समान चापो में विभाजित होता है। पूर्णिमा से अगले पंद्रह दिनो तक प्रत्येक चाप चंद्रमा की चाल को दर्शाता है और प्रत्येक चाप एक चंद्र दिवस की प्रगति की गणना करता है जिसे हिंदू कैलेंडर में तिथि बोला जाता है।

एकादशी को आप आसान शब्दों में 11वीं तिथि, ग्यारस या 11वें चंद्र दिवस के रूप में समझ सकते हैं। ग्यारहवीं तिथि चंद्रमा के बढ़ते और घटते चरण से एकदम सटीक मेल खाती है, इसलिए शुक्ल पक्ष में चंद्रमा आपको पृथ्वी से अपने पूर्ण चमकते आकार का 3/4 भाग यानी 75 प्रतिशत ही दिखलाई देता है और कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को आपको चंद्रमा का 1 /4 भाग या 25 प्रतिशत चमकीला भाग ही दिखलाई पड़ता है।

एकादशी व्रत कथा

एकादशी का व्रत के महत्व से जुडी कई कहानियां हैं जिनमे से एकादशी व्रत से जुड़ी एक लोकप्रिय कहानी इस प्रकार से है।

एक बार की बात है मांधाता नाम का एक राजा था जो कि बहुत ही धर्म परायण और एक कुशल शासक था और वो बहुत ही बुद्धिमानी और न्याय प्रियता से अपने राज्य पर शासन करता था।

हालांकि राजा के अच्छे और नेक कामों के बावजूद उनका राज्य भीषण सुखे की चपेट में आ गया और अकाल पड़ गया और उनकी प्रजा भूख और प्यास से बुरी तरह से पीड़ित थी और हर तरफ त्राहि त्राहि मच गई।

इस विकट आपदा से छुटकारा पाने के लिए राजा मांधाता ने ऋषि मुनियों से परामर्श किया तो ऋषि मुनियों ने राजा को बताया कि अंगिरा नाम के एक ऋषि के श्राप के कारण ये सुखा पड़ा है। राजा के पूर्वज ने ऋषि अंगिरा का अपमान किया था जिसके परिणाम स्वरूप अंगिरा ऋषि ने हमारे राज्य को सूखे का श्राप दिया था।

ऋषियों ने राजा मांधाता को सलाह दी कि वे एकादशी व्रत का पालन करें और जगत के पालनकर्ता भगवान विष्णु से अपने पूर्वजों के पापो की क्षमा मांगे। राजा मान्धाता ने ऋषि मुनियों की सलाह का पालन किया और श्रद्धा पूर्वक एकादशी का व्रत किया।

राजा मांधाता की श्रद्धा पूर्वक भक्ति और तपस्या से प्रकट होकर, भगवान विष्णु उनके समक्ष प्रकट हुए। राजा मान्धाता ने भगवान विष्णु से अपने पूर्वजों के द्वारा किए गए जाने अंजाने पापो के लिए क्षमा याचना की और उनके राज्य में पड़े भीषण सुखे को समाप्त करने की प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने भक्त की भक्ति भाव से की गई साधना और प्रार्थना को स्वीकार किया और राजा के राज्य में प्रचुर वर्षा हुई। इससे राज्य में पड़ा सूखा समाप्त हुआ और प्रजा को कष्टों से मुक्ति मिली।

उस दिन से, एकादशी हिंदुओ के लिए उपवास और प्रार्थना का एक महत्वपूर्ण दिन बन गया। ऐसा माना जाता है कि भक्तिभाव और हृदय की पवित्रता से एकादशी का व्रत करने से मनुष्यो को अपने पापो और जीवन में आ रही बाधाओं और दुखों को दूर करने और मोक्ष प्राप्त करने में मदद मिल सकती है।

इस प्रकार, राजा मांधाता की एकादशी व्रत की कहानी कई कहानियों में से एक है जो कि एकादशी का व्रत रखने और जगत के पालन कर्ता भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त करने की महिमा पर प्रकाश डालती है।

एकादशी के व्रत के दिन दान का भी बहुत महत्त्व बताया गया है और जरूरतमंदों को भोजन, कपड़े और अन्य सामान दान करते हैं और ऐसा माना जाता है कि इस दिन किए गए अच्छे कर्मों से भगवान विष्णु का आशीर्वाद मिलता है।

एकादशी पर चावल क्यों नहीं खाना चाहिए?

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार एकादशी के दिन चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। एक पुरानी कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा के सिर से पसीना नीचे गिरा और उस पसीने से एक राक्षस की उत्पत्ति हुई। जब राक्षस ने भगवान ब्रह्मा से रहने के जगह देने को कहा तो ब्रह्मा ने उन्हें एकादशी के दिन मनुष्यो द्वारा खाए गए चावल में रहने और पेट में कीड़े के रूप में परिवर्तित हो कर रहने के लिए कहा।

धार्मिक मान्यता के साथ साथ एकादशी के दिन चावल न खाने के पीछे एक वैज्ञानिक कारण भी है। ये एक वैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य है कि अमावस्या के ग्यारहवें दिन अर्थात शुक्ल पक्ष की एकादशी और पुर्णिमा के ग्यारहवें दिन यानी कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन वायुमंडलीय दबाव लगभग शून्य होता है।

एकादशी के अतिरिक्त किसी भी अन्य दिन उपवास रखना एक थकाने वाला अनुभव हो सकता है क्योंकि वायुमंडलीय दवाब उपवास रखने वाले के शरीर पर दबाव डालेगा। लेकिन एकादशी के दिन वायुमंडलीय दवाब लगभग शून्य होने से ऐसा नहीं होगा। इसलिए एकादशी के दिन उपवास रखने से हमारे शरीर को विशेष रूप आंत्र प्रणाली और संपूर्ण पाचन तंत्र को साफ करने का मौका मिलता है। इसे शरीर को डिटॉक्सिफाई करना भी कह सकते हैं।

एकादशी के अगले दिन पूर्णिमा से बारहवें दिन और अमावस से बारहवें दिन सुबह जल्दी भोजन करने का सुझाव दिया जाता है ताकी शरीर पर किसी भी प्रकार के वातावरण के दवाब से बचा जा सके।

विष्णु मंत्र

1.ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

2.हरे राम हरे रामा, रामा रामा हरे हरे

हरे कृष्ण हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा हरे हरे

व्रत कथा, आरती, चालीसा और ज्योतिष

लोहड़ी त्यौहार और दूल्हा भट्टी की कहानी

बसंत पंचमी की कहानी

करवा चौथ व्रत 2026: जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

पति पत्नी के आपसी प्रेम की निशानी के रूप में करवा चौथ हर साल कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि करवा चौथ का व्रत सबसे पहले शक्ति स्वरूपा देवी पार्वती ने रखा था जिसके फलस्वरूप उन्हें अखंड सौभाग्य की प्राप्ति हुई थी।

Karwa chauth par lal saree mai suhagin avtar mai karwa mata


करवा चौथ कब है?

करवा चौथ 2026 का त्यौहार इस साल 29 अक्टूबर 2026 गुरुवार को मनाया जायेगा। कार्तिक चतुर्थी का प्रारंभ गुरुवार 29 अक्टूबर मध्यरात्रि 01:06 am से शुरू होकर 29 अक्टूबर गुरुवार रात्रि 10:09 pm तक रहेगा।

उदया तिथि के हिसाब से करवा चौथ 2026 का त्यौहार 29 अक्टूबर 2026 गु

करवा चौथ पूजा मुहूर्त

करवा चौथ 2026 का पूजा मुहूर्त29 अक्टूबर को शाम 05:38 बजे से लेकर 06:56 बजे तक रहेगा। करवा चौथ व्रत पूजन की कुल अवधि 1 घंटा 18 मिनट की रहेगी।

करवा चौथ व्रत की विधि

सूर्योदय से पहले उठकर सरगी खाएं।करवा चौथ के दिन सूर्योदय से पहले ही स्नान कर ले। देवी देवताओं की नियमित पूजा जो आप रोज करती है, उसे करने के बाद पूरे दिन के लिए निर्जला व्रत रखें।

शाम के समय भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान कार्तिकेय जी को रोली, फूल, प्रसाद और श्रृंगार का सामान अर्पित करें।

उसके बाद करवा चौथ की व्रत कथा या कहानी का पाठ करें या सुने। चौथ माता की आरती का गान करें। अक्सर शाम के समय आस पड़ोस की महिलाएं भी एकत्रित होकर एक साथ करवा माता की पूजा करती है और व्रत कथा सुनती है।

करवा चौथ पर रात को जब चंद्र देवता के उदय होने पर उनका पति सहित दर्शन करें और उन्हें जल के लोटे से अर्ध्य दे।

इसकेबाद आटे का एक दिया जलाएं और छलनी में रखकर छ्लनी से पहले चंद्र देवता और उसके बाद पति देव को देखें, उसके बाद दिया वही छत पर या जहां भी आप पूजा कर रही है, वहां रख दे।

उसके बाद पति देव को तिलक लगाएं और प्रसाद खिलाएं और उनके हाथों से पानी पीकर अपना व्रत पूर्ण करें और उनके चरण स्पर्श करें।

उसके बाद अपनी सास को फल, मेवा और वस्त्र आदि उपहार दे और पति पत्नी दोनों उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद ले।

करवा चौथ व्रत की कथा (कहानी)

देवी करवा जो कि अपने पति के साथ तुंगभद्रा नदी के पास रहती थी। एक दिन करवा के पति नदी मैं स्नान करने गए तो एक मगरमच्छ ने उनका पैर पकड़ लिया और नदी मैं खींचने लगा।

मृत्यु करीब देखकर करवा के पति करवा को पुकारने लगे। करवा दौड़कर नदी के पास पहुंची और पति को मौत के मुंह में ले जाते मगरमच्छ को देखा। करवा ने तुरंत एक कच्चा धागा लेकर मगरमच्छ को एक पेड़ से बांध दिया।

करवा के सतीत्व के कारण मगरमच्छ कच्चे धागे में ऐसा बंधा की टस से मस नहीं हो पा रहा था। करवा के पति और मगरमच्छ दोनों के प्राण संकट में फंसे थे।

करवा ने यमराज को पुकारा और अपने पति को जीवनदान देने और मगरमच्छ को मृत्यु दण्ड देने के लिए कहा।

यमराज ने करवा से कहा कि मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि मगरमच्छ की आयु अभी शेष है और तुम्हारे पति की आयु पूरी हो चुकी है।

क्रोधित होकर करवा ने यमराज से कहा कि अगर आपने ऐसा नहीं किया तो मैं आपको शाप दे दूंगी। सती के शाप से भयभीत होकर यमराज ने तुरंत मगरमच्छ को यमलोक भेज दिया और करवा के पति को जीवनदान दिया।

इसलिए करवा चौथ के व्रत मैं सुहागिन स्त्रियां करवा माता से प्रार्थना करती है कि हे करवा माता जैसे आपने अपने पति को मृत्यु के मुंह से वापिस निकाल लिया, वैसे ही मेरे सुहाग की भी रक्षा करना।

करवा माता की तरह सावित्री ने भी कच्चे धागे से अपने पति को वट वृक्ष के नीचे लपेट कर रखा था। कच्चे धागे में लिपटा प्रेम और विश्वास ऐसा था की यमराज सावित्री के पति के प्राण अपने साथ लेकर नही जा सके।

सावित्री के पति के प्राण को यमराज को लौटाना पड़ा और सावित्री को वरदान देना पड़ा की उनका सुहाग हमेशा बना रहेगा और दोनो प्रेम पूर्वक लंबे समय तक साथ रहेंगे।

पति की अनुपस्थिति में करवा चौथ का व्रत

अगर किसी जरूरी कार्य वश पति अगर शहर से बाहर हो जैसे सेना में ड्यूटी पर हो या विदेश में हो और करवा चौथ पर घर न आ पाएं तो आप उनका फोटो लेकर या आजकल मोबाइल पर व्हाट्स अप पर वीडियो काल कर के भी अपना व्रत पूर्ण कर सकती है।

माहवारी (Periods) में करवा चौथ का व्रत

अगर इस दिन किसी महिला को माहवारी चल रही हो तो परेशान होने की कतई जरूरत नहीं है। वह व्रत रख सकती है और आराम करें और अनावश्यक थकावट से बचे।

बस उसे सिर्फ इतनी सावधानी रखनी है कि उसे किसी भी पूजा सामग्री को छूना नही है।

शाम को चंद्र देव के दर्शन करके और प्रणाम करके अपना व्रत पूर्ण कर सकती है, जल का अर्घ्य और छ्लनी पूजा अगले करवा चौथ पर कर सकती है।

करवा चौथ पर मंगलसूत्र का महत्व

करवा चौथ का व्रत करने वाली महिलाएं व्रत के नियमों का सख्ती से पालन करती है। करवा चौथ पर गले में मंगलसूत्र धारण करने का विशेष महत्व है। अगर सोने या चांदी का मंगलसूत्र ना भी हो तो बाजार से आर्टिफिशियल ले सकती है।

करवा चौथ पर चांद कब निकलेगा? (Karva Chauth Moon Timings)

करवा चौथ पर विभिन्न स्थानों पर चंद्र देव दर्शन का समय इस प्रकार रहने की संभावना है। 29 अक्टूबर 2026 करवा चौथ को उत्तर भारत में मौसम साफ रहने का पूर्वानुमान है, इसलिए चंद्र देव दर्शन समय पर होने की संभावना है।

करवा चौथ 2026 को चांद निकलने का समय रात्रि 08:11 मिनट (दिल्ली) रहेगा। देश के अलग अलग क्षेत्रों में थोड़ा बहुत अंतर हो सकता है।

हरियाणा में चांद कब निकलेगा? (Chand Kab Niklega)

फरीदाबाद- 08:13 pm, पलवल- 08:20 pm, झज्जर- 08:16 pm, रोहतक- 08:20 pm भिवानी- 08:21 pm, चरखी दादरी- 08:21 pm, हिसार- 08:29 pm, हांसी- 08:25 pm, फतेहाबाद- 08:26 pm, सिरसा- 08:27 pm, जींद- 08:26 pm, कैथल- 08:26 pm

पंचकुला- 08:19 pm, अंबाला- 08:09 pm, यमुनानगर- 08:22 pm, कुरुक्षेत्र- 08:26 pm, करनाल- 08:26 pm, पानीपत- 08:27 pm, सोनीपत- 08:26 pm, गुड़गांव- 08:14 pm, मेवात- 08:27 pm, रेवाड़ी- 08:27 pm, महेंद्रगढ़- 08:28 pm

करवा चौथ व्रत के वस्त्र (Karwa Chauth Dress)

करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं या कुंवारी कन्या जो भी व्रत रख रही है, उन्हें इस दिन काले रंग के वस्त्र धारण करने से परहेज करना चाहिए।

हिंदू शास्त्रों के अनुसार शुभ कार्य के दौरान काले रंग की मनाही होती है। श्रृंगार आदि में भी काले रंग से परहेज़ करें।

करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाओं को सफेद रंग के वस्त्र धारण नही करने चाहिए। जहां तक संभव हो सके, इस दिन सुहाग के प्रतीक लाल रंग या कोई और मनपसंद रंग के वस्त्र धारण कर सकती है।

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