खाटू श्याम बाबा की आरती: संपूर्ण लिरिक्स हिंदी में

हारे के सहारे, लखदातार खाटू श्याम जी को कलियुग का अवतार माना जाता है। शीश के दानी बाबा श्याम की आरती करने से सारे संकट दूर होते हैं और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। खासकर एकादशी और फाल्गुन मेले में इस आरती का विशेष महत्व है।

खाटू श्याम बाबा की आरती - खाटू नरेश, शीश के दानी

खाटू श्याम जी की आरती का महत्व

मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से बाबा श्याम की आरती गाता है, बाबा उसकी झोली खुशियों से भर देते हैं। व्यापार में वृद्धि, रोगों से मुक्ति और कोर्ट-कचहरी के मामलों में विजय के लिए श्याम बाबा की आरती अत्यंत फलदायी है।

आरती खाटू नरेश की - संपूर्ण लिरिक्स

ओम जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे
खाटू धाम विराजत, अनुपम रूप धरे।।
ओम जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे।।

रत्न जड़ित सिंहासन, सिर पर चंवर ढुरे
तन केसरिया बागो, कुण्डल श्रवण पड़े।।
ओम जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे।।

गल पुष्पों की माला, सिर पार मुकुट धरे
खेवत धूप अग्नि पर, दीपक ज्योति जले।।
ओम जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे।।

मोदक खीर चूरमा, सुवरण थाल भरे
सेवक भोग लगावत, सेवा नित्य करे।।
ओम जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे।।

झांझ कटोरा और घड़ियावल, शंख मृदंग धुरे
भक्त आरती गावे, जय जयकार करे।।
ओम जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे।।

जो ध्यावे फल पावे, सब दुख से उबरे
सेवक जन निज मुख से, श्री श्याम श्याम उचरे।।
ओम जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे।।

श्री श्याम बिहारी जी की आरती, जो कोई नर गावे
कहत भक्तजन, मनवांछित फल पावे।।
ओम जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे।।

जय श्री श्याम हरे, बाबा जी श्री श्याम हरे
निज भक्तों के तुमने, पूरण काज करे।।
ओम जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे।।

ओम जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे।।
खाटू धाम विराजत, अनुपम रूप धरे
ओम जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे।।

बोल खाटू नरेश की जय, बोल शीश के दानी की जय

खाटू श्याम आरती की विधि

1. एकादशी के दिन सुबह स्नान कर बाबा को गुलाब इत्र और चूरमा का भोग लगाएं।
2. दीपक जलाकर पूरी श्रद्धा से आरती करें।
3. आरती के बाद 11 बार "श्री श्याम" नाम का जाप करें।
4. मान्यता है कि लगातार 11 एकादशी तक आरती करने से हारे हुए काम भी बन जाते हैं।

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लक्ष्मी माता की आरती: संपूर्ण लिरिक्स हिंदी में

धन, वैभव और समस्त सुखों की देवी लक्ष्मी माता की आरती हर घर में की जाती है. हिंदू धर्म के सबसे बड़े त्यौहार दीवाली पर तो लक्ष्मी पूजन का विशेष विधान है, जिसमें गणेश जी, माता लक्ष्मी, देवी सरस्वती और कुबेर देवता की पूजा-अर्चना की जाती है.

लक्ष्मी माता की आरती – ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः, कमल पर विराजमान धन की देवी

लक्ष्मी माता की आरती का महत्व

माता लक्ष्मी को धन, ऐश्वर्य और सौभाग्य की देवी माना जाता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति शुक्रवार और दीवाली की रात श्रद्धा से लक्ष्मी आरती करता है, उसके घर में कभी दरिद्रता नहीं आती। इस आरती को करने से व्यापार में वृद्धि, नौकरी में तरक्की और घर में सुख-शांति बनी रहती है।

संपूर्ण लक्ष्मी माता की आरती लिरिक्स

मैया जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता
तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता
ओम जय लक्ष्मी माता

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग माता
सूर्य-चंद्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता
ओम जय लक्ष्मी माता

दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता
ओम जय लक्ष्मी माता

तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता
कर्म प्रभाव प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता
ओम जय लक्ष्मी माता

जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता
ओम जय लक्ष्मी माता

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता
ओम जय लक्ष्मी माता

शुभ गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि-जाता
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता
ओम जय लक्ष्मी माता

महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई जन गाता
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता
ओम जय लक्ष्मी माता

सब बोलो लक्ष्मी माता की जय, लक्ष्मी नारायण की जय

आरती की विधि

1. आरती पूरी होने के बाद तुलसी माता में आरती जरूर दिखानी चाहिए।
2. इसके बाद घर के सभी सदस्यों को आरती लेनी चाहिए।
3. अंत में माता को भोग लगाकर प्रसाद वितरण करें।

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संतोषी माता की आरती: संपूर्ण लिरिक्स हिंदी में

संतोषी माता को हिंदू धर्म में संतोष, शांति और मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाली देवी के रूप में जाना जाता है। हर शुक्रवार को उनकी पूजा और आरती करके परिवार में सुख, शांति और समृद्धि की कामना की जाती है। माना जाता है कि संतोषी माता की आरती श्रद्धापूर्वक गाने से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं और घर में खुशहाली आती है।

संतोषी माता की सुंदर प्रतिमा और आरती का दिव्य दृश्य

संतोषी माता की आरती

जय संतोषी माता जय संतोषी माता
अपने सेवक जन को सुख संपति दाता
जय संतोषी माता

सुंदर चीर सुनहरी मां धारण कीन्हों
हीरा पन्ना दमके तन सिंगार लीन्हों
जय संतोषी माता

गेरू लाल छटा छवि बदन कमल सोहै
मंद हंसत करुणामयी त्रिभुवन मोहै
जय संतोषी माता

स्वर्ण सिंहासन बैठी चंवर ढुरे प्यारे
धूप, दीप, नैवेद्य, मधुमेवा भोग धरे न्यारे
ओम जय संतोषी माता

गुड और चना परमप्रिय तामें संतोष कियो
संतोषी कहलाई भक्तन विभव दियो
जय संतोषी माता

शुक्रवार प्रिय मानत आज दिवस सोही
भक्त मंडली आई कथा सुनत वोही
जय संतोषी माता

मंदिर जगमग ज्योति मंगल ध्वनि छाई
विनय करें हम बालक चरनन सिर नाई
जय संतोषी माता

भक्ति भावमय पूजा अंगीकृत कीजै
जो मन बसे हमारे इच्छा फल दीजै
जय संतोषी माता

दुःखी, दरिद्री, रोगी संकट मुक्त किये
बहु धन धान्य भरे घर सुख सौभाग्य दिये
जय संतोषी माता

ध्यान धरो जो नर तेरो, मनवांछित फल पायो
पूजा कथा श्रवण कर, घर आनंद आयो
जय संतोषी माता

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रविवार व्रत कथा: सूर्य देव की पूजा विधि, नियम और लाभ

रविवार व्रत कथा हिंदू धर्म में सूर्य देव की उपासना से जुड़ी एक अत्यंत पवित्र कथा है. सूर्य देव को आरोग्य, यश, तेज और जीवन शक्ति का प्रतीक माना गया है. जो भक्त श्रद्धा और नियमपूर्वक सूर्य देव का रविवार का व्रत रखते हैं, उनके जीवन में रोग, दरिद्रता और ग्रह दोष दूर होते हैं. सूर्य देव का व्रत और पूजा उपासना राज सम्मान दिलवाती है और राज भय दूर होता है.

रविवार व्रत कथा - सूर्य देवता अपने रथ पर

रविवार व्रत की कथा

एक बुढ़िया थी। वह प्रत्येक रविवार को सवेरे ही गोबर से घर लीपकर, स्नान आदि कर भगवान की पूजा करती थी। फिर भोजन तैयार कर भगवान को भोग लगाकर, स्वयं भोजन करती थी।

श्री हरि की कृपा से उसका घर सभी प्रकार के सुख एवं धन धान्य से पूर्ण था और किसी प्रकार का कोई विघ्न या दुःख नहीं था। घर में सब प्रकार से आनंद रहता था।

उसकी एक पड़ोसन, जिसकी गाय का गोबर वह बुढ़िया रोज लाया करती थी, उस बुढ़िया की संपन्नता से जलने लगी।

वह विचार करने लगी की यह बुढ़िया रोज मेरी गाय का गोबर ले जाती है, इसलिए अगले ही दिन से वह अपनी गाय को अपने घर के भीतर बांधने लगी।

वह रविवार का दिन था। बुढ़िया गाय का गोबर न मिलने के कारण अपने घर को लीप न सकी। उस दिन उसने न तो भोजन बनाया और न स्वयं भोजन किया।

इस प्रकार उसने निराहार व्रत किया। रात्रि हो गई और वह बुढ़िया भूखी ही सो गई। रात्रि में सूर्य भगवान ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए और भोजन न बनाने और भोग न लगाने का कारण पूछा।

बुढ़िया ने कहा कि उसे गोबर नही मिला और इस कारण वह आपका भोग न लगा सकी।

तब सूर्य भगवान ने कहा कि हे माता! हम तुमको ऐसी गाय देते हैं जो सभी इच्छाएं पूर्ण करती है, क्योंकि तुम हमेशा रविवार को पूरा घर गाय के गोबर से लीपकर, भोजन बनाकर और मेरा भोग लगाकर ही स्वयं भोजन करती हो, इससे मैं बहुत प्रसन्न हूं।

मैं निर्धन को धन और बांझ स्त्रियों को पुत्र देकर उनके दुखों को दूर करता हूं तथा अंत समय में मोक्ष देता हूं। बुढ़िया को स्वप्न में ऐसा वरदान देकर सूर्य देव अंतर्ध्यान हो गए।

प्रात:काल जब उस बुढ़िया की आंख खुली तो उसने देखा कि उसके घर के आंगन में एक अति सुन्दर गाय और बछड़ा बंधे हुए हैं।

गाय और बछड़े को देखकर वह वृद्धा अत्यंत प्रसन्न हुई और उनको घर के बाहर बांध दिया और उनके खाने के लिए चारा भी डाल दिया।

जब उसकी पड़ोसन ने बुढ़िया के घर के बाहर एक अति सुन्दर गाय और बछड़े को बंधा देखा तो द्वेष के कारण उसका ह्रदय जल उठा।

जब उसने देखा कि गाय ने सोने का गोबर किया है तो वह चोरी से उस गाय का गोबर उठाकर ले गई और अपनी गाय का गोबर उठाकर उसकी जगह रख गई।

वह प्रतिदिन ऐसा ही करती। सीधी साधी बुढ़िया को उसकी इस चालाकी की खबर तक नहीं हुई। सर्वव्यापी ईश्वर ने सोचा कि चालाक पड़ोसन के कर्म से बुढ़िया ठगी जा रही है।

एक दिन सूर्य भगवान ने संध्या के समय अपनी माया से बड़े जोर की आंधी चला दी। बुढ़िया ने आंधी के भय से अपनी गाय और बछड़े को घर के भीतर बांधने लगी।

पड़ोसन ने देखा कि बुढ़िया गाय को घर के भीतर बांधने लगी है और उसका सोने का गोबर उठाने का दांव नही चलता तो वह ईर्ष्या और डाह से जल उठी।

अन्य कोई उपाय न देख पड़ोसन ने उस देश के राजा की सभा में जाकर कहा "महाराज मेरे पड़ोस में एक वृद्धा के पास ऐसी गाय है जो नित्य सोने का गोबर देती है।

आप वह सोना प्राप्त कर उससे प्रजा का पालन करिए। वह वृद्धा इतने सोने का क्या करेगी।"

उसकी बात सुनकर राजा ने अपने दूतों को उस बुढ़िया के घर से गाय लाने का आदेश दिया। बुढ़िया प्रात: भगवान का भोग लगा भोजन ग्रहण करने जा रही थी कि राजा के कर्मचारी गाय और बछड़े को खोलकर ले गए।

वृद्धा बहुत रोई-चिल्लाई किंतु राजा के कर्मचारियों के सामने भला कोई क्या कहता? उस दिन वृद्धा गाय के वियोग में भोजन न कर सकी और रात भर रो-रोकर ईश्वर से गाय को पुन: पाने के लिए प्रार्थना करती रही।

राजा सोने का गोबर देने वाली गाय को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ लेकिन अगले ही दिन सुबह जैसे ही वह उठा तो उसे सारा महल गोबर से भरा दिखाई देने लगा।

राजा यह देखकर घबरा गया। सूर्य भगवान ने रात्रि में राजा को स्वप्न में कहा - "हे राजा! इस गाय को उस वृद्धा को लौटाने में ही तेरा भला हैं। उसके रविवार के व्रत से प्रसन्न होकर मैंने यह गाय उसे दी थी।"

प्रात: होते ही राजा ने वृद्धा को महल में बुलाकर बहुत से धन के साथ सम्मान सहित गाय-बछड़ा उसे लौटा दिया और अपने कार्य के लिए क्षमा प्रार्थना की।

इसके बाद राजा ने उसकी पड़ोसन को बुलाकर उचित दंड दिया। इतना करने के बाद राजा के महल से गंदगी दूर हुई।

उसी दिन से राजा ने सभी नगर निवासियों को आदेश दिया कि राज्य की समृद्धि और अपनी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए रविवार का व्रत करें।

रविवार को सूर्य भगवान का व्रत करने से नगर के सभी लोग सुखी जीवन व्यतीत करने लगे। अब कोई बीमारी या प्राकृतिक प्रकोप उस नगर पर नहीं होता था और सारी प्रजा सुख समृद्धि से रहने लगी।

रविवार व्रत की आरती

कहुं लगि आरती दास करेंगे
सकल जगत जाकी जोति विराजे
सात समुद्र जाके चरण बसे
काह भयो जल कुंभ भरे हो राम
कोटि भानु जाके नख की शोभा
कहा भयो मंदिर दीप धरे हो राम
भार अठारह रामा बलि जाके
कहा भयो शिर पुष्पधरे हो राम
छप्पन भोग जाके प्रतिदिन लागे
कहा भयो नैवेद्य धरे हो राम
अमित कोटि जाके बाजा बाजें
कहा भयो झंकारा करे हो राम
चार वेद जाके मुख की शोभा
कहा भयो ब्रह्मवेद पढ़े हो राम
शिव सनकादिक आदि ब्रह्मादिक
नारद मुनि जाको ध्यान धरे हो राम
हिम मंदार जाके पवन झंकोरे
कहा भयो शिव चंवर ढुरे हो राम
लख चौरासी बन्ध छुड़ाए
केवल हरियश नामदेव गाए हो राम

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