सोलह सोमवार व्रत कथा: Vrat Katha, Vidhi, Niyam, Aarti PDF

सोलह सोमवार व्रत सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाला व्रत है। मनोरथ सिद्धि के लिए सोमवार के दिन भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती का आशीर्वाद के लिए सोलह सोमवार का व्रत रखा जाता है। खासकर कुंवारी कन्याएं मनपसंद वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत को रखती हैं।

सोलह सोमवार व्रत कथा के लिए भगवान शिव का चित्र

सोलह सोमवार व्रत की कथा (Solah Somvar Vrat Katha)

मृत्यु लोक में भ्रमण करने की इच्छा करके एक समय श्री भूतनाथ भगवान भोलेनाथ माता पार्वती के साथ मृत्यु लोक में पधारे। भ्रमण करते-करते दोनों विदर्भ देश के अंतर्गत अमरावती नाम की अति सुंदर नगरी में पहुंचे।

अमरावती नगरी अमरा पुरी के समान सब प्रकार के सुखों से परिपूर्ण थी। उसमें वहां के राजकुमार द्वारा बनवाया गया अति रमणीक शिव जी का मंदिर भी था। भगवान शंकर भगवती पार्वती के साथ उस मंदिर में निवास करने लगे।

एक समय माता पार्वती भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न देख मजाक करने की इच्छा से बोलीं - "हे प्रभु महाराज! आज तो हम दोनों चौसर खेलेंगे।" शिव जी ने अपनी प्राण प्रिय पत्नी की बात को मान लिया और चौसर खेलने लगे।

उसी समय उस मंदिर का पुजारी ब्राह्मण मंदिर में पूजा करने आया। माता पार्वती ने पुजारी से प्रश्न किया - "पुजारी जी बताओ, इस बाजी में हम दोनों में से किसकी जीत होगी।" ब्राह्मण बिना कुछ सोचे-विचारे शीघ्रता से बोल उठा कि महादेव की जीत होगी।

थोड़ी देर में बाजी समाप्त हो गई और पार्वती जी की विजय हुई। पार्वती जी बहुत क्रोधित हुईं और ब्राह्मण को झूठ बोलने के अपराध के कारण श्राप देने को उद्धत हुईं। भोलेनाथ ने माता पार्वती को बहुत समझाया परंतु उन्होंने ब्राह्मण को कोढ़ी होने का श्राप दे ही दिया।

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कुछ समय बाद पार्वती जी के श्रापवश पुजारी के शरीर में कोढ़ पैदा हो गया। वह अनेक प्रकार से दुखी रहने लगा। पुजारी को श्राप-कष्ट भोगते हुए जब बहुत दिन हो गए तब एक दिन देवलोक की अप्सराएं शिवजी की पूजा हेतु उस मंदिर में पधारीं। पुजारी के कोढ़ के कष्ट को देखकर उन्होंने बड़े दया भाव से उसके रोगी होने का कारण पूछा।

पुजारी ने निःसंकोच सारी बात उन्हें बता दी। वे अप्सराएं बोलीं- "हे पुजारी! अब तुम अधिक दुखी मत होना, भगवान शिव तुम्हारे कष्ट को दूर कर देंगे। तुम सब व्रतों में श्रेष्ठ सोलह सोमवार का व्रत भक्ति भाव से किया करो।"

सोलह सोमवार व्रत विधि (16 Somvar Vrat Vidhi)

पुजारी ने अप्सरा से विनम्र भाव से सोलह सोमवार व्रत विधि पूछी। अप्सरा ने पुजारी को बताया - सोमवार को भक्ति भाव के साथ व्रत करें। स्नान उपरांत स्वच्छ वस्त्र पहनें।

संध्या व उपासना के बाद आधा सेर गेहूं का आटा लें और उसके 3 भाग करें। घी, गुड़, दीप, धूप, नैवेद्य, सुपारी, बेलपत्र, जनेऊ का जोड़ा, चंदन, अक्षत, पुष्प आदि के द्वारा प्रदोष काल में भगवान शंकर का विधि से पूजन करें।

तत्पश्चात तीन भागों में से एक भाग शिवजी को अर्पण करें और बाकी दो भागों को शिव जी का प्रसाद समझकर उपस्थित भक्तजनों में बांट दें और आप भी प्रसाद ग्रहण करें। इस विधि से सोलह सोमवार व्रत करें।

17वें सोमवार को पाव सेर पवित्र गेहूं के आटे की बाटी बनाएं। उसमें घी और गुड़ मिलाकर चूरमा बनाएं। भगवान भोलेनाथ को भोग लगाकर उपस्थित भक्तों में बांटें। इसके बाद कुटुंब सहित प्रसाद ग्रहण करें तो शिव जी की कृपा से उसके सभी मनोरथ पूरे हो जाते हैं।

ऐसा कहकर अप्सराएं स्वर्ग लोक को चली गईं। ब्राह्मण ने यथा विधि सोलह सोमवार व्रत किया तथा भगवान शिव की कृपा से रोग मुक्त होकर आनंद से रहने लगा।

कुछ दिन बाद शिवजी और माता पार्वती फिर उस मंदिर में पधारे। ब्राह्मण को निरोग देख पार्वती जी ने ब्राह्मण से रोग मुक्त होने का उपाय पूछा तो ब्राह्मण ने सोलह सोमवार व्रत की कथा सुनाई।

पार्वती जी अति प्रसन्न हो ब्राह्मण से व्रत की विधि पूछकर स्वयं व्रत करने को तैयार हो गईं। व्रत करने के बाद उनकी मनोकामना पूर्ण हुई तथा उनके रूठे हुए पुत्र स्वामी कार्तिकेय स्वयं माता के आज्ञाकारी हुए।

कार्तिकेय जी को अपने इस विचार परिवर्तन का रहस्य जानने की इच्छा हुई। वे माता से बोले- "हे माता! आपने ऐसा कौन सा उपाय किया जिससे मेरा मन आपकी ओर आकर्षित हुआ।" पार्वती जी ने वही सोलह सोमवार व्रत की कथा उनको सुनाई।

कार्तिकेय जी ने कहा- "इस व्रत को तो मैं भी करूंगा क्योंकि मेरा प्रिय मित्र ब्राह्मण बिछड़ गया है। मेरी उससे मिलने की बहुत इच्छा है।" कार्तिकेय जी ने भी यह व्रत किया और उनका प्रिय मित्र मिल गया। मित्र ने इस आकस्मिक मिलन का रहस्य कार्तिकेय जी से पूछा तो वे बोले, "हे मित्र! हमने तुम्हारे मिलने की इच्छा से सोलह सोमवार का व्रत किया था।"

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अब तो ब्राह्मण मित्र को अपने विवाह की बड़ी इच्छा हुई। उसने कार्तिकेय जी से व्रत की विधि पूछी और यथा विधि व्रत किया। व्रत के प्रभाव से जब वह किसी कार्यवश विदेश गया तो वहां के राजा की लड़की का स्वयंवर था।

राजा ने प्रण किया था कि जिस राजकुमार के गले में सब प्रकार से श्रृंगारित हथिनी माला डालेगी, मैं उसी के साथ अपनी प्यारी पुत्री का विवाह कर दूंगा। शिव जी की कृपा से वह ब्राह्मण भी स्वयंवर देखने की इच्छा से राजसभा में एक ओर बैठ गया।

नियत समय पर हथिनी आई और उसने जयमाला उस ब्राह्मण के गले में डाल दी। राजा ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार बड़ी धूमधाम से अपनी कन्या का विवाह उस ब्राह्मण के साथ कर दिया। ब्राह्मण को बहुत सा धन और सामान देकर संतुष्ट किया। ब्राह्मण सुंदर राजकन्या पाकर सुख से जीवन व्यतीत करने लगा।

एक दिन राजकन्या ने अपने पति से प्रश्न किया- "हे प्राणनाथ! आपने ऐसा कौन सा भारी पुण्य किया था जिसके प्रभाव से हथिनी ने सब राजकुमारों को छोड़कर आपको वरण किया?" ब्राह्मण बोला- "हे प्राण प्रिये! मैंने अपने मित्र कार्तिकेय जी के कहे अनुसार सोलह सोमवार का व्रत किया था जिसके प्रभाव से मुझे तुम जैसी रूपवान पत्नी की प्राप्ति हुई है।" व्रत की महिमा सुनकर राजकन्या को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह भी पुत्र की कामना करके व्रत करने लगी।

शिव जी की दया से उसके गर्भ से एक अति सुंदर, सुशील, धर्मात्मा और विद्वान पुत्र उत्पन्न हुआ। माता-पिता दोनों उस देवपुत्र को पाकर अति प्रसन्न हुए और उसका लालन-पालन भली प्रकार से करने लगे।

जब पुत्र समझदार हुआ तो एक दिन उसने अपनी माता से प्रश्न किया- "हे मां! तुमने ऐसा कौन सा व्रत एवं तप किया है जो मेरे जैसा पुत्र तुम्हारे गर्भ से उत्पन्न हुआ।" माता ने सोलह सोमवार व्रत की कथा पुत्र को बताई। पुत्र ने सब तरह के मनोरथ पूर्ण करने वाले सरल व्रत को सुना तो वह भी राज्य पर अधिकार पाने की इच्छा से हर सोमवार को यथा विधि यह व्रत करने लगा।

व्रत शुरू होने के बाद एक देश के वृद्ध राजा के दूतों ने आकर उसको राजकन्या के लिए वरण किया। राजा ने अपनी पुत्री का विवाह ऐसे सर्वगुण संपन्न ब्राह्मण युवक के साथ करके बड़ा सुख प्राप्त किया। वृद्ध राजा के दिवंगत हो जाने पर इसी ब्राह्मण युवक को सिंहासन पर बैठाया गया क्योंकि दिवंगत राजा के कोई पुत्र नहीं था।

राज्य का उत्तराधिकारी होकर भी ब्राह्मण पुत्र सोलह सोमवार का व्रत करता रहा। जब सत्रहवां सोमवार आया तो विप्र पुत्र ने अपनी पत्नी से पूजन सामग्री लेकर शिव पूजा के लिए शिवालय में चलने को कहा। परंतु उसकी पत्नी ने उसकी आज्ञा की परवाह नहीं की और दास-दासियों द्वारा सब सामग्री शिवालय भिजवा दी, परंतु स्वयं नहीं गई।

जब राजा ने शिवजी का पूजन समाप्त किया, तब आकाशवाणी हुई- "हे राजा! अपनी इस रानी को राजमहल से निकाल दे, नहीं तो यह तेरा सर्वनाश कर देगी।" आकाशवाणी सुनकर राजा के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उसने मंत्रणा गृह में आकर अपने सभासदों को बुलाकर पूछा, "हे मंत्रियों! मुझे आज शिवजी की आकाशवाणी हुई है कि तुम अपनी इस रानी को निकाल दो, नहीं तो यह तेरा सर्वनाश कर देगी।"

राज्य के मंत्री तथा सभी सदस्य आदि सब विस्मय और दुःख में डूब गए क्योंकि जिस कन्या के कारण राज्य मिला है, राजा उसी को निकालने की बात कर रहा है, यह कैसे हो सकेगा?

राजा ने अपनी पत्नी को राजमहल से निकाल दिया। रानी दुखी हृदय से भाग्य को कोसती हुई नगर के बाहर चली गई। बिना चप्पल, फटे वस्त्र पहने, भूख से दुखी धीरे-धीरे चलकर वह एक गांव में पहुंची।

वहां एक बुढ़िया सूत कातकर बेचने जाती थी। रानी की करुण दशा देखकर बोली- "चल, तुम मेरा सूत बिकवा दे। मैं वृद्ध हूं, भाव नहीं जानती हूं।" यह बात सुन रानी ने बुढ़िया के सिर से सूत की गठरी उतारकर अपने सिर पर रख ली। थोड़ी देर बाद आंधी आई और बुढ़िया का सूत पोटली सहित उड़ गया। बेचारी बुढ़िया पछताती रह गई और रानी को अपने से दूर रहने को कहा।

इसके बाद रानी एक तेली के घर गई तो शिवजी के प्रकोप के कारण तेली के सब मटके उसी क्षण चटक गए। तेली ने भी रानी को अपने घर से निकाल दिया। अत्यंत दुःख पाती हुई रानी एक नदी के तट पर गई तो नदी का समस्त जल सूख गया।

तत्पश्चात रानी एक वन में गई, वहां सरोवर में पानी पीने गई और उसके हाथ का स्पर्श होते ही सरोवर के नील कमल के समान साफ जल में असंख्य कीड़े पैदा होकर गंदा हो गया। रानी ने भाग्य पर दोषारोपण करते हुए उस जल को पीकर पेड़ की शीतल छाया में विश्राम करना चाहा, परंतु रानी जिस पेड़ के नीचे जाती उसी पेड़ के पत्ते तत्काल टूटकर गिर जाते।

वन, सरोवर, जल की ऐसी दशा देख गाय चराते ग्वालों ने अपने गुसाईं जी से, जो उस जंगल में स्थित मंदिर में पुजारी थे, यह बात बताई। गुसाईं जी के आदेश अनुसार ग्वाले रानी को पकड़कर गुसाईं जी के पास लाए। रानी की मुख कांति और शारीरिक शोभा देखकर गुसाईं जी जान गए कि यह अवश्य ही कोई विधि की गति की मारी कुलीन स्त्री है।

पुजारी ने रानी से कहा- "पुत्री! मैं तुमको अपनी पुत्री के समान रखूंगा। तुम मेरे आश्रम में ही रहो। मैं तुमको किसी प्रकार का कष्ट नहीं दूंगा।" गुसाईं जी के वचन सुनकर रानी को धीरज हुआ। वह आश्रम में रहने लगी।

रानी जो भी भोजन बनाती उसमें कीड़े पड़ जाते, जल भरकर लाती तो उसमें भी कीड़े पड़ जाते। रानी की यह दशा देखकर गुसाईं जी भी बहुत दुखी थे, उन्होंने रानी से पूछा, "हे बेटी! तुम्हारे ऊपर कौन से देवता का कोप है जिससे तुम्हारी ऐसी दशा है।"

पुजारी की बात सुन रानी ने शिवजी महाराज के पूजन का बहिष्कार करने की बात बताई तो पुजारी शिव जी महाराज की अनेक प्रकार से स्तुति करते हुए रानी से बोले, "हे पुत्री! तुम सब मनोरथ पूर्ण करने वाले सोलह सोमवार व्रत को करो और उसके प्रभाव से तुम अपने कष्ट से मुक्त हो सकोगी।"

गुसाईं जी की बात मानकर रानी ने सोलह सोमवार व्रत किए, सत्रहवें सोमवार को विधि-विधान सहित पूजन किया। उस पूजन के प्रभाव से राजा के हृदय में विचार उत्पन्न हुआ कि रानी को गए हुए बहुत समय व्यतीत हो गया, न जाने कहां-कहां भटकती होगी, उसे ढूंढना चाहिए। यह सोच रानी को तलाश करने के लिए राजा ने चारों दिशाओं में अपने दूत भेजे। वे दूत रानी को ढूंढते हुए पुजारी के आश्रम में पहुंचे।

वहां रानी को पाकर दूतों ने पुजारी से रानी को अपने साथ ले जाने का आग्रह किया, परंतु पुजारी ने मना कर दिया। दूत चुपचाप लौट आए और महाराज को रानी का पता बतलाया। रानी का पता पाकर राजा स्वयं पुजारी के आश्रम में गए और पुजारी से कहा- "हे महाराज! जो देवी आपके आश्रम में रहती हैं वह मेरी पत्नी है। शिवजी के कोप से मैंने इनको त्याग दिया था। अब इन पर से शिवजी का प्रकोप शांत हो गया है, इसलिए मैं इन्हें लेने आया हूं। आप इनको मेरे साथ जाने की आज्ञा दीजिए।"

गुसाईं जी ने राजा के वचन को सत्य समझकर रानी को राजा के साथ जाने की अनुमति दे दी। गुसाईं जी की आज्ञा पाकर रानी प्रसन्न होकर राजा के साथ महल में आई। नगरवासियों ने नगर द्वार तथा नगर को तोरण, बंदनवारों और बहुत सुंदर ढंग से सजाया। घर-घर में मंगल गान होने लगे। पंडितों ने विविध वेद मंत्रों का उच्चारण कर अपनी राजरानी का स्वागत किया।

इस प्रकार से रानी ने धूमधाम से पुनः अपनी राजधानी में प्रवेश किया। महाराज ने ब्राह्मणों को अनेक तरह से दान आदि देकर संतुष्ट किया। याचकों को धन-धान्य दिया। नगर में स्थान-स्थान पर भोजनालय खुलवाए, जहां भूखों को मुफ्त भरपेट भोजन मिलता था।

इस प्रकार से राजा शिव जी की कृपा का पात्र हो राजधानी में रानी के साथ अनेक तरह के सुखों का भोग करता हुआ सोलह सोमवार का व्रत करने लगा। विधिवत शिव पूजन करते हुए इस लोक में अनेक सुखों को भोगने के पश्चात दोनों शिवपुरी को पधारे।

16 सोमवार व्रत के लाभ (Benefits of 16 Somvar Vrat)

जो मनुष्य मन, वचन, कर्म और भक्ति भाव से सोलह सोमवार का व्रत एवं पूजन इत्यादि विधिवत करता है, वह इस लोक में समस्त सुखों को भोगकर अंत में शिवपुरी को प्राप्त होता है। यह व्रत सब मनोरथों को पूर्ण करने वाला है।

शिव जी की आरती

जय शिव ओंकारा, ॐ जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा। ॐ जय शिव ओंकारा।।

एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे। ॐ जय शिव ओंकारा।।

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे। ॐ जय शिव ओंकारा।।

अक्षमाला वनमाला मुंडमाला धारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी। ॐ जय शिव ओंकारा।।

श्वेतांबर पीतांबर बाघंबर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे। ॐ जय शिव ओंकारा।।

कर के मध्य कमंडल चक्र त्रिशूल धारी।
सुखकारी दुखहारी जग पालन कारी। ॐ जय शिव ओंकारा।।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका। ॐ जय शिव ओंकारा।।

लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा।
पार्वती अर्धांगी, शिवलहरी गंगा। ॐ जय शिव ओंकारा।।

पर्वत सोहे पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा। ॐ जय शिव ओंकारा।।

जटा में गंगा बहत है, गल मुंडन माला।
शेष नाग लिपटाए, ओढ़े मृगछाला। ॐ जय शिव ओंकारा।।

काशी में विराजे विश्वनाथ, नंदी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी। ॐ जय शिव ओंकारा।।

त्रिगुणस्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी सुख संपति पावे। ॐ जय शिव ओंकारा।।

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Shanidev Chalisa | श्री शनि चालीसा पाठ | PDF

शनि चालीसा हिंदू धर्म में भगवान श्री शनिदेव को प्रसन्न करने का एक प्रभावशाली स्त्रोत्र है। शनि चालीसा का नियमित पाठ करने से शनि दोष, साढ़ेसाती, ढैया और जन्म कुंडली में निर्मित अशुभ प्रभावों से राहत मिलती है। शनिवार के दिन श्रद्धा और विश्वास से शनि चालीसा पढ़ने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है और कर्मों का शुभ फल प्राप्त होता है। जो भक्त शनि देव की कृपा प्राप्त करना चाहते है, उनके लिए शनि चालीसा विशेष रूप से लाभकारी माना गया है।


श्री शनि चालीसा (Shani Chalisa)

दोहा

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।
दीनन के दुख दूर करि, कीजे नाथ निहाल॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनुहु विनय महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखुहु जन की लाज॥

जयति जयति शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥

चारि भुजा तनु श्याम विराजे। माथे रतन मुकुट छबि छाजे॥

परम विशाल मनोहर भाला। ठेढ़ी दृष्टि भृकुटि विक्राला॥

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिय माल मुक्तन मणि दमके॥

कर में गदा त्रिशूल कुठारा। पल बिच करे अरिंही संहारा॥

पिंगल कृष्णो छाया नन्दन। यम कौनस्थ रौद्र दुखभंजन॥

सौरी मन्द शनि दश नामा। भानु पुत्र पूजनही सब कामा॥

जा पर प्रभु प्रसन्न हो जाहि। रंक हूं राव करें क्षण माहीं॥

पर्वत हू तृण होई निहारत। तृण हू को पर्वत करिंह डार्ट॥

राज मिलत बन रामिंह दिनह्यो। कैकई हुं मति हरि लिन्हियो॥

बन हूं में मृग कपट दिखाई। मातु जानकी गई चुराई॥

लखन हीं शक्ति विकल करि डारा। मचिगा दल में हहाकारा॥

रावण की गति-मति बौराई। रामचन्द्र सौं बैर बढ़ाई॥

दियो कीट करि कंचन लंका। बजि बजरंग बीर की डंका॥

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा। चित्र मयूर निगलि गै हारा॥

हार नौलखा लाग्यो चोरी। हाथ पैर डरवायो तोरी॥

भारी दशा निकृष्ट दिखायो। तेली हीं घर कोल्हू चलवायो॥

विनय राग दीपक मंह किनिह्यो। तब प्रसन्न प्रभु हीं सुख दिन्हियो॥

हरिश्चन्द्र नृप नारी बिकानी। आपन्हु भरे डोम घर पानी॥

तैसे नल पर दशा सिरानी। भूंजी-मीन कूद गई पानी॥

श्री शंकर हीं गहों जब जाई। पारवती को सती कराई॥

तनिक विलोकत ही करि रीसा। नभ उड़ी गयो गौरी सुत सीसा॥

पाण्डव पर भे दशा तुम्हारी। बची द्रौपदी होति उधारी॥

कौरव के भी गति मति मारियो। युद्ध महाभारत करि डारियो॥

रवि केंह मुख मंह धरि ततकाला। लेकर कूदी परयो पताला॥

शेष देव लखि विनती लाई। रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥

वाहन प्रभु के सात सुजाना। जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥

जांबुक सिंह आदि नख धारी। सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं। हय ते सुख सम्पति उपजावें॥

गर्दभ हानि करै बहु काजा। सिंह सिद्ध कर राज समाजा॥

जांबुक बुद्धि नष्ट कर डारे। मृग दे कष्ट प्राण संहारे॥

जब आंवे प्रभु स्वान सवारी। चोरी आदि होय डर भारी॥

तैसिही चारि चरण यह नामा। स्वर्ण लौह चांदी अरु तामा॥

लौह चरण पर जब प्रभु आवैं। धन जन सम्पत्ति नष्ट करांवे॥

समता ताम्र रजत शुभकारी। स्वर्ण सर्व सर्व सुख मंगल भारी॥

जो यह शनि चरित्र नित गांवे। कभी न दशा निकृष्ट सतावे॥

अद्भुत नाथ दिखांवे लीला। करें शत्रु के नशि बलि ढीला॥

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई। विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत। दीप दान दे बहु सुख पावत॥

कहत राम सुन्दर प्रभु दासा। शनि सुमिरत सुख हौत प्रकाशा॥

दोहा

पाठ शनिश्चर देव को की हों भक्त तैयार।
करत पाठ चालीस दिन हो भवसागर पार॥


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Nirjala Ekadashi 2026: उपवास और आध्यात्मिक महत्व का दिन

निर्जला एकादशी व्रत की हिंदू धर्म में बहुत मान्यता है। ये व्रत हर साल मई माह के आखिर में या जून माह में आता है। यह व्रत हिंदू कैलेंडर के ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनाया जाता है। इस दिन व्रत रखने से धन, समृद्धि, स्वास्थ्य, लम्बी आयु और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

निर्जला एकादशी 2026 - भगवान विष्णु की पूजा

निर्जला एकादशी का व्रत बहुत कठिन माना जाता है। निर्जला एकादशी का नाम संस्कृत भाषा के शब्द "निर्जला" के नाम पर रखा गया है जिसका अर्थ होता है "पानी के बिना"। इसका मतलब यह है कि जो भी इस व्रत को रखते हैं वे पूरे दिन और रात में भोजन या पानी का सेवन नहीं करते हैं।

आमतौर पर निर्जला एकादशी गंगा दशहरा के बाद आती है परन्तु कई बार ग्रह गणना के अनुसार दोनों एक ही दिन हो सकती हैं। निर्जला एकादशी के व्रत को धारण करने वाले जातक को गंगा दशहरा से ही तामसी भोजन अर्थात तीखे और खट्टे भोजन से परहेज कर लेना चाहिए।

निर्जला एकादशी का महत्व

निर्जला एकादशी हिंदू पौराणिक कथाओं में बहुत महत्व रखती है और उपवास और तपस्या के लिए बहुत ही शुभ दिन माना जाता है। निर्जला एकादशी के दिन स्वयं को शुद्ध करने और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने का एक तरीका माना जाता है।

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित है जो जगत के संरक्षक और पालनहार हैं। भगवान विष्णु को पृथ्वी को बुरी शक्तियों से बचाने के लिए विभिन्न रूपों में अवतार लेने के लिए जाना जाता है। भक्तों का मानना है कि निर्जला एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और उनका आशीर्वाद मिलता है।

निर्जला एकादशी के अन्य नाम

निर्जला एकादशी को ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी, पांडव भीम एकादशी, भीमसेन एकादशी, पांडव निर्जला एकादशी, पांडव एकादशी और भीम एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

निर्जला एकादशी 2026 का शुभ मुहूर्त

  • निर्जला एकादशी तारीख: 25 जून 2026, गुरुवार
  • एकादशी तिथि प्रारंभ: 24 जून 2026, सायंकाल 06:12 बजे
  • एकादशी तिथि समाप्त: 25 जून 2026, सायंकाल 08:09 बजे
  • व्रत का दिन: उदयातिथि के अनुसार 25 जून 2026 को
  • पारण का समय: 26 जून 2026, सुबह 05:25 बजे से 08:13 बजे तक

निर्जला एकादशी पूजा सामग्री

निर्जला एकादशी की पूजा के लिए आपको निम्न सामग्री की आवश्यकता होगी:

  • भगवान विष्णु का चित्र या मूर्ति
  • पीले फूल, फल, मिठाई, नारियल
  • धूप, कपूर, दीपक, देसी घी
  • पंचामृत, पान, सुपारी, लौंग, चंदन, अक्षत
  • तुलसी के पत्ते - ध्यान दें: तुलसी पत्र एकादशी से एक दिन पहले ही तोड़ कर रख लें

एकादशी के दिन तुलसी पत्ते क्यों नहीं तोड़ने चाहिए?

भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है और विष्णु जी की पूजा तुलसी पत्र के बिना अधूरी मानी जाती है। पौराणिक शास्त्रों के अनुसार माता तुलसी का विवाह देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु से करवाने की परंपरा है। माता तुलसी हर एकादशी के दिन भगवान विष्णु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।

ऐसे में निर्जला एकादशी के दिन तुलसी को अगर जल दिया जाता है तो इससे उनका व्रत खंडित हो जाएगा और तुलसी पत्ते तोड़ने से उनका ध्यान भी भंग होगा। इसलिए एकादशी के दिन तुलसी को जल देना और तुलसी पत्र तोड़ना मना किया जाता है। ग्रहण के समय और सूर्यास्त के बाद भी तुलसी को जल देना या पत्ते तोड़ना वर्जित है।

निर्जला एकादशी व्रत विधि

  1. निर्जला एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और साफ, पीले वस्त्र धारण करें।
  2. घर के मंदिर में देसी घी का दीपक जलाएं।
  3. गंगाजल से भगवान विष्णु का अभिषेक करें और उन्हें पीले फल, फूल और तुलसी पत्र अर्पित करें।
  4. निर्जला एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  5. दिनभर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें और रात्रि जागरण करें।
  6. द्वादशी के दिन शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण करें।

निर्जला एकादशी व्रत कथा

निर्जला एकादशी से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कथा महाभारत के पांच पांडव भाइयों में से एक महाबली भीमसेन की है। भीमसेन अपनी अतृप्त भूख के लिए जाने जाते थे। वह एक ही बार में बहुत अधिक मात्रा में भोजन ग्रहण कर सकते थे। हालांकि, वह भोजन और पानी की शारीरिक आवश्यकता के कारण अन्य एकादशी के व्रतों का पालन नहीं कर सके।

एक बार ऋषि वेदव्यास पांडवों का हाल जानने उनके घर पहुंचे। बातचीत के दौरान भीम ने ऋषि वेदव्यास से कहा कि माता कुंती, भाई युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब मुझे एकादशी को व्रत रखने को कह रहे हैं, परंतु मैं अपनी भूख के कारण ऐसा नहीं कर पा रहा। कृपया कोई उपाय बताएं।

ऋषि व्यास ने भीमसेन से कहा कि वह निर्जला एकादशी का व्रत कर सकते हैं। क्योंकि निर्जला एकादशी को सबसे बड़ी और सर्वश्रेष्ठ एकादशी माना जाता है और इस एक एकादशी को नियम पूर्वक व्रत करने से साल की सभी 24 एकादशियों का फल मिलता है।

भीमसेन ऋषि वेदव्यास के कहे अनुसार निर्जला एकादशी के व्रत का पालन करने के लिए सहमत हुए और पूरे दिन-रात भोजन और पानी से परहेज किया। भगवान विष्णु उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें अन्य सभी एकादशी व्रतों के समान लाभ प्रदान किया। तभी से इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है।

निर्जला एकादशी का पारण

पारण का अर्थ होता है उपवास तोड़ना। एकादशी व्रत के अगले दिन अर्थात द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद एकादशी व्रत का पारण करने का विधान है। द्वादशी तिथि को ही पारण किया जाना आवश्यक है क्योंकि द्वादशी पर पारण न करना अपराध के समान माना जाता है और एकादशी व्रत का फल प्राप्त नहीं होता।

पारण नियम: पारण से पहले ब्राह्मण को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें। फिर स्वयं अन्न ग्रहण करके व्रत खोलें।

कैसे करें निर्जला एकादशी का पालन

निर्जला एकादशी को हिंदू धर्म को मानने वाले लोग बड़ी भक्ति और अनुशासन के साथ मनाते हैं। इस दिन भक्त भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और उनका आशीर्वाद लेने के लिए ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करते हैं।

निर्जला एकादशी के व्रत के दौरान, भक्त किसी भी भोजन या पानी का सेवन नहीं करते हैं। जो लोग पूर्ण उपवास करने में असमर्थ हैं, वे एक समय फलाहार कर सकते हैं। इसमें फल, दूध या दूध से बनी वस्तुओं का सेवन किया जा सकता है।

निर्जला एकादशी का उपवास अगले दिन द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद पारण मुहूर्त में समाप्त होता है। भक्त भगवान विष्णु को भोग लगाकर प्रसाद से अपना उपवास तोड़ते हैं। प्रसाद में फल, मिठाई और सात्विक भोजन शामिल होता है।

निर्जला एकादशी व्रत के लाभ

  • निर्जला एकादशी व्रत के प्रभाव से भगवान श्री विष्णु की कृपा बनी रहती है और घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
  • इस व्रत को रखने वाले जातकों को जाने-अनजाने पापों से मुक्ति मिलती है।
  • संतान सुख, दांपत्य सुख और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।
  • जीवन में धन, स्वास्थ्य, दीर्घायु मिलती है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • साल की सभी 24 एकादशियों का पुण्य केवल इस एक व्रत से मिल जाता है।

निष्कर्ष

निर्जला एकादशी एक महत्वपूर्ण पर्व है जिसे दुनिया भर के हिंदू बड़ी भक्ति, श्रद्धा और अनुशासन से मनाते हैं। यह उपवास और तपस्या का दिन है जो आत्मा को शुद्ध करता है और आध्यात्मिक ज्ञान देता है। इस व्रत के लिए अपार इच्छाशक्ति चाहिए, लेकिन यह धन, स्वास्थ्य और दीर्घायु जैसे महान लाभ प्रदान करता है।

निर्जला एकादशी का व्रत जगत के पालनहार भगवान विष्णु का आशीर्वाद पाने का सबसे उत्तम तरीका है। यह त्योहार हमें अनुशासन, भक्ति और आत्म-नियंत्रण का महत्व सिखाता है, जो एक सार्थक जीवन जीने के लिए आवश्यक है।

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संतोषी माता को हिंदू धर्म में संतोष, शांति और मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाली देवी के रूप में जाना जाता है। हर शुक्रवार को उनकी पूजा और आरती करके परिवार में सुख, शांति और समृद्धि की कामना की जाती है। माना जाता है कि संतोषी माता की आरती श्रद्धापूर्वक गाने से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं और घर में खुशहाली आती है।

संतोषी माता की सुंदर प्रतिमा और आरती का दिव्य दृश्य

संतोषी माता की आरती

जय संतोषी माता जय संतोषी माता
अपने सेवक जन को सुख संपति दाता
जय संतोषी माता

सुंदर चीर सुनहरी मां धारण कीन्हों
हीरा पन्ना दमके तन सिंगार लीन्हों
जय संतोषी माता

गेरू लाल छटा छवि बदन कमल सोहै
मंद हंसत करुणामयी त्रिभुवन मोहै
जय संतोषी माता

स्वर्ण सिंहासन बैठी चंवर ढुरे प्यारे
धूप, दीप, नैवेद्य, मधुमेवा भोग धरे न्यारे
ओम जय संतोषी माता

गुड और चना परमप्रिय तामें संतोष कियो
संतोषी कहलाई भक्तन विभव दियो
जय संतोषी माता

शुक्रवार प्रिय मानत आज दिवस सोही
भक्त मंडली आई कथा सुनत वोही
जय संतोषी माता

मंदिर जगमग ज्योति मंगल ध्वनि छाई
विनय करें हम बालक चरनन सिर नाई
जय संतोषी माता

भक्ति भावमय पूजा अंगीकृत कीजै
जो मन बसे हमारे इच्छा फल दीजै
जय संतोषी माता

दुःखी, दरिद्री, रोगी संकट मुक्त किये
बहु धन धान्य भरे घर सुख सौभाग्य दिये
जय संतोषी माता

ध्यान धरो जो नर तेरो, मनवांछित फल पायो
पूजा कथा श्रवण कर, घर आनंद आयो
जय संतोषी माता

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